BHAJAN

संतो सो निज देस हमारा

संतो सो निज देस हमारा।
जहां जाय फिर हंस न आवे भवसागर की धारा।

सूर चंद नहिं तंह प्रकासत नहिं नभ मंडल तारा।
उदय न अस्त दिवस नहिं रजनी बिन ज्योति उजियारा।

पांच तत्त्व तीन गुण तंह नाहिं नाहिं तंह सृष्टि पसारा।
तंह न माया कृत प्रपंच यह लोग कुटुम परिवारा।

क्षुधा तृष्णा नहिं सीत उष्ण तंह सुख दुख को संचारा।
आधि न व्याधि उपाधि कछु नाहिं पाप पुण्य बिस्तारा।

ऊंच नीच कुल की मरयादा आस्रम वर्ण विचारा।
धर्म अधर्म तंह किछु नाहिं संजम नियम आचारा।

अति अभिराम धाम सर्वोपर सोभा जासु अपारा।
कहे कबीर सुनो भाई साधो तीन लोक से न्यारा।

~ कबीर साहब

  • [[आशा से श्रद्धा तक — सत्र 3 “तंह न माया कृत प्रपंच यह लोग कुटुम परिवारा।”]]