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Shakya Mirror

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं। प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहीं।।

Reflections on consciousness, ego, and liberation —
through Vedanta, Bhagavad Gita, and the words that crack things open.

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May 10, 2026

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कबीर की इस पंक्ति के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संसार, संबंध और उपलब्धियाँ केवल विषय हैं—जीवन नहीं। जब मनुष्य इन्...

May 01, 2026

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Apr 26, 2026

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 10 — अहंकार का क्षय = बुद्धि, निर्मलता, प्रेम और तेज का उदय

अहंकार के रहते बुद्धि दासी होती है, संबंध विकृत होते हैं और जीवन भय से संचालित होता है।जैसे ही “मैं” ढीला पड़ता है, व...

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Apr 25, 2026

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