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Shakya Mirror

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं। प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहीं।।

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Reflections on consciousness, ego, and liberation —
through Vedanta, Bhagavad Gita, and the words that crack things open.

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May 10, 2026

जीवन बनाम विषय — सत्र 7: “निकसि जब प्रान जावैंगे, कोई नहीं काम आवेंगे”

कबीर की इस पंक्ति के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संसार, संबंध और उपलब्धियाँ केवल विषय हैं—जीवन नहीं। जब मनुष्य इन्...

May 01, 2026

शून्यता सप्तति छंद 32 — संस्कृत और असंस्कृत दोनों ही अहंकार के विस्तार हैं

हम अक्सर मानते हैं कि भौतिक विषय बंधन हैं और आध्यात्मिक विषय मुक्ति। पर क्या सचमुच ऐसा है? यह चिंतन दिखाता है कि चाहे...

Apr 26, 2026

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 10 — अहंकार का क्षय = बुद्धि, निर्मलता, प्रेम और तेज का उदय

अहंकार के रहते बुद्धि दासी होती है, संबंध विकृत होते हैं और जीवन भय से संचालित होता है।जैसे ही “मैं” ढीला पड़ता है, व...

Apr 26, 2026

ऋभु गीता अध्याय 4, श्लोक 20-21 — “मैं” का सूक्ष्म जाल: सत्य, पवित्रता, शांति और आत्म-छल

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Apr 25, 2026

संबंध, अपेक्षा और अधूरापन — सत्र 6: “सजन परिवार सुत दारा, सभी एक रोज़ है न्यारा”

दो अधूरे केंद्र जब एक-दूसरे से पूर्णता की अपेक्षा करते हैं, तो संबंध संघर्ष में बदल जाते हैं। यह शीर्षक उस मनोवैज्ञान...

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