ताओ ते चिंग अध्याय 15 — सही कर्म प्रयास से नहीं, ठहराव से जन्म लेता है

ठहराव, कर्म और घटने की कला
“क्या आपमें वह ठहराव है कि आप स्थिर रहें,
जब तक कि मिट्टी नीचे न बैठ जाए और जल स्वच्छ न हो जाए?क्या आप तब तक अविचल रह सकते हैं,
जब तक सही कर्म स्वतः ही प्रकट न हो जाए?”— ताओ ते चिंग, अध्याय 15
मनुष्य का सामान्य विश्वास यह है कि जीवन की लगभग हर समस्या का समाधान अधिक प्रयास में छिपा है। यदि कुछ ठीक नहीं हो रहा, तो और कोशिश करो। यदि सफलता नहीं मिल रही, तो और मेहनत करो। यदि मन अशांत है, तो और अनुशासन लाओ। यदि आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो रही, तो और साधना करो।
लगभग हर क्षेत्र में हमारा सहज निष्कर्ष यही होता है कि कमी प्रयास की है।
मन की गहराई में एक वाक्य लगातार उपस्थित रहता है—“मैंने पर्याप्त नहीं किया। मुझे और करना चाहिए था।”
यह वाक्य केवल एक मनोवैज्ञानिक आदत नहीं है। यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक संरचना का परिणाम है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक मनुष्य को यही सिखाया जाता है कि जीवन का अर्थ बढ़ने में है। बड़ा बनो। आगे बढ़ो। अधिक प्राप्त करो। अधिक प्रभावशाली बनो। अधिक सफल बनो। अधिक ज्ञानी बनो। यहाँ तक कि आध्यात्मिकता में भी वही भाषा प्रवेश कर जाती है—और विकसित हो जाओ, और ऊँचे उठो, और आगे बढ़ो।
मानो मनुष्य का मूल कर्तव्य स्वयं को लगातार विस्तार देना हो।
यही कारण है कि ताओ की यह वाणी पहली बार सुनने पर अस्वाभाविक लगती है। वह कहती है—रुको।
और केवल क्षणभर रुकने को नहीं कहती। वह उस प्रकार के ठहराव की बात करती है जिसमें मन हस्तक्षेप करना बंद कर दे।
क्योंकि समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ मन यह मान लेता है कि हर परिस्थिति को उसकी सक्रियता की आवश्यकता है।
अशांत जल और अशांत मन
लाओ त्सु जिस जल की बात करते हैं, वह केवल बाहरी जल नहीं है। वह मन का रूपक है।
यदि किसी पात्र में स्वच्छ जल हो और उसमें मिट्टी मिला दी जाए, तो जल मटमैला हो जाएगा। अब यदि कोई व्यक्ति उसे शीघ्र साफ़ करना चाहे और लगातार उसे हिलाता रहे, तो क्या होगा?
मिट्टी कभी नीचे नहीं बैठेगी।
जितना अधिक हस्तक्षेप होगा, उतनी अधिक अशुद्धि दिखाई देगी।
पर यदि वही व्यक्ति पात्र को शांत छोड़ दे, तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया आरम्भ होती है। मिट्टी नीचे बैठने लगती है। जल स्वयं स्वच्छ होने लगता है।
यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि जल को स्वच्छ करने का कार्य किसी ने नहीं किया।
स्वच्छता किसी प्रयास का परिणाम नहीं थी।
वह केवल हस्तक्षेप के समाप्त होने का परिणाम थी।
मन की स्थिति भी ऐसी ही है।
अधिकांश लोग अपने विचारों, भय, इच्छाओं और उलझनों को बलपूर्वक नियंत्रित करना चाहते हैं। वे बेचैनी को समाप्त करने के लिए बेचैनी का ही उपयोग करते हैं। वे संघर्ष को समाप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं।
परंतु जो साधन स्वयं समस्या का हिस्सा हो, वह समाधान कैसे बन सकता है?
इसलिए अनेक बार मन की सबसे बड़ी आवश्यकता किसी नई तकनीक, नए संकल्प या नए प्रयास की नहीं होती।
उसकी आवश्यकता केवल इतनी होती है कि उसे अनावश्यक छेड़छाड़ से मुक्त छोड़ दिया जाए।
सही कर्म का प्रश्न
लाओ त्सु का दूसरा प्रश्न और भी अधिक चुनौतीपूर्ण है।
“क्या आप तब तक अविचल रह सकते हैं,
जब तक सही कर्म स्वतः ही प्रकट न हो जाए?”
सामान्यतः हम मानते हैं कि पहले निर्णय होगा, फिर कर्म होगा।
परंतु अधिकांश निर्णय वास्तव में स्पष्टता से नहीं, बल्कि भय, असुरक्षा, महत्वाकांक्षा और मानसिक शोर से उत्पन्न होते हैं।
जब मन अशांत होता है, तब वह कर्म तो करता है, पर सही कर्म नहीं कर पाता।
यहीं एक गहरी बात समझने योग्य है।
सही कर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे अहंकार खोजकर प्राप्त कर ले।
सही कर्म स्पष्टता से उत्पन्न होता है।
और स्पष्टता तब आती है जब मानसिक धूल बैठ जाती है।
संरचना को इस प्रकार देखा जा सकता है:
मानसिक अशांति → भ्रम → जल्दबाज़ी → गलत कर्म
मानसिक स्पष्टता → देखना → समझना → सहज कर्म
यहाँ सहज कर्म का अर्थ निष्क्रियता नहीं है।
ताओ कहीं भी आलस्य की शिक्षा नहीं देता।
वह केवल यह कहता है कि कर्म का स्रोत महत्वपूर्ण है।
यदि कर्म भ्रम से उत्पन्न है, तो उसकी गति चाहे कितनी भी अधिक हो, वह संघर्ष को जन्म देगा।
यदि कर्म स्पष्टता से उत्पन्न है, तो उसमें अनावश्यक तनाव नहीं होगा।
इच्छा-शक्ति का मिथक
आधुनिक मनुष्य की सबसे प्रिय अवधारणाओं में से एक है—इच्छाशक्ति।
उसे विश्वास है कि पर्याप्त इच्छाशक्ति से वह स्वयं को बदल सकता है, सुधार सकता है, उन्नत कर सकता है और अंततः पूर्ण बना सकता है।
पर यहाँ एक सूक्ष्म प्रश्न उठता है।
यदि समस्या वास्तव में है ही नहीं, तो उसका उपचार क्या करेगा?
यदि कोई रोग काल्पनिक हो, तो सबसे प्रभावशाली दवा भी व्यर्थ होगी।
इसी अर्थ में कहा जा सकता है:
इच्छाशक्ति उस रोग की दवा है जिसका अस्तित्व ही नहीं है।
अधिकांश आध्यात्मिक संघर्षों का स्रोत यह मान्यता है कि “मैं जैसा हूँ, वैसा नहीं होना चाहिए।”
फिर मन स्वयं को बदलने निकल पड़ता है।
एक भाग दूसरे भाग से युद्ध करने लगता है।
एक विचार दूसरे विचार को दबाने लगता है।
एक पहचान दूसरी पहचान को नष्ट करने का प्रयास करती है।
परंतु यह पूरा संघर्ष उसी केंद्र से संचालित हो रहा होता है जिसे बदला जाना है।
यही अहं की विशेषता है।
वह स्वयं को समस्या भी घोषित करता है और स्वयं को समाधान भी।
इस प्रकार संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता।
बढ़ने की संस्कृति
यदि हम समाज को ध्यान से देखें तो पाएँगे कि लगभग पूरा लोकधर्म और लोकसंस्कार विस्तार की भाषा बोलता है।
बच्चे को आशीर्वाद दिया जाता है—बड़ा बनो।
युवक से कहा जाता है—आगे बढ़ो।
व्यापारी से कहा जाता है—व्यापार बढ़ाओ।
राजनीति में शक्ति बढ़ाओ।
समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाओ।
ज्ञान बढ़ाओ।
संपत्ति बढ़ाओ।
प्रभाव बढ़ाओ।
और यदि व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में चला जाए, तो वहाँ भी अक्सर कहा जाता है—चेतना बढ़ाओ, अनुभव बढ़ाओ, उपलब्धियाँ बढ़ाओ।
भाषा बदल जाती है, दिशा नहीं।
हर जगह वृद्धि का ही उत्सव है।
किन्तु धर्म की वास्तविक दिशा इससे भिन्न है।
धर्म किसी वस्तु को जोड़ने का प्रयास नहीं करता।
धर्म घटाने की प्रक्रिया है।
धर्म यह नहीं पूछता कि तुम्हारे पास क्या और जोड़ा जाए।
धर्म यह पूछता है कि जो अनावश्यक है, वह कैसे हटे।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
लोकसंस्कृति → अधिक बनो
धर्म → कम हो जाओ
लोकसंस्कृति → विस्तार
धर्म → अनावश्यक का क्षय
अहंकार की वृद्धि और आत्मिक क्षय
जब वृद्धि स्वयं में लक्ष्य बन जाती है, तब अहं उसका सबसे बड़ा लाभार्थी बनता है।
अहंकार को सदैव विस्तार चाहिए।
वह विशेष बनना चाहता है।
वह अलग दिखना चाहता है।
वह महत्वपूर्ण होना चाहता है।
यहाँ तक कि उसकी आध्यात्मिक महत्वाकांक्षा भी इसी संरचना का हिस्सा बन सकती है।
वह संसार में सबसे धनी नहीं बन पाया, तो सबसे ज्ञानी बनना चाहता है।
सबसे शक्तिशाली नहीं बन पाया, तो सबसे पवित्र बनना चाहता है।
पर केंद्र वही रहता है।
“मैं”।
यही कारण है कि अहंकार को कैंसर के समान कहा जा सकता है।
कैंसर की मूल प्रवृत्ति अनियंत्रित वृद्धि है।
वह बढ़ता है, फैलता है, विस्तार करता है।
परंतु उसका विस्तार जीवन नहीं लाता।
वह जीवन का विनाश करता है।
उसी प्रकार अहंकार की वृद्धि भी आंतरिक स्वतंत्रता नहीं लाती।
वह केवल मानसिक जटिलता बढ़ाती है।
जहाँ विशेषता समाप्त होती है
मनुष्य सामान्यतः उन व्यक्तियों से प्रभावित होता है जो उसे असाधारण प्रतीत होते हैं।
परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से एक विचित्र तथ्य सामने आता है।
जहाँ वास्तविक जागरण होता है, वहाँ व्यक्ति विशेष दिखाई देना बंद हो जाता है।
क्योंकि विशेषता का अनुभव तुलना से उत्पन्न होता है।
और तुलना अहं की भाषा है।
जो वास्तव में जाग गया है, उसमें कोई आत्म-प्रदर्शन नहीं बचता।
वह अपने बारे में कोई कहानी बनाए रखने में रुचि नहीं रखता।
उसकी उपस्थिति में जो दिखाई देता है, वह व्यक्ति की विशेषता नहीं, बल्कि व्यक्ति की अनुपस्थिति है।
यही कारण है कि ऐसी बातें मन को सहज नहीं लगतीं।
वे हमारी पूरी मनोवैज्ञानिक संरचना के विपरीत हैं।
अंदर बैठा अहंकार उन्हें सुनना नहीं चाहता।
यदि कोई कहे कि समाधान और अधिक बनने में नहीं, बल्कि कम होने में है, तो पूरा मानसिक ढाँचा विरोध करने लगता है।
क्योंकि उसकी पहचान ही वृद्धि पर आधारित है।
योजना, नियंत्रण और प्रेम
यह सब सुनने के बाद एक स्वाभाविक आपत्ति उठती है।
क्या फिर सोचना भी छोड़ दें?
क्या योजना बनाना बंद कर दें?
क्या जीवन को पूरी तरह संयोग पर छोड़ दें?
नहीं।
समस्या योजना में नहीं है।
समस्या उस मनोवैज्ञानिक आग्रह में है जो योजना को सुरक्षा का साधन बना लेता है।
व्यावहारिक जीवन में योजना आवश्यक है। घर बनाना हो, यात्रा करनी हो, किसी कार्य का आयोजन करना हो—वहाँ विचार और योजना स्वाभाविक हैं।
परंतु जब मन स्वयं के अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए लगातार भविष्य का निर्माण करने लगता है, तब योजना भय का विस्तार बन जाती है।
अंतर सूक्ष्म है।
एक योजना कार्य की आवश्यकता से उत्पन्न होती है।
दूसरी योजना मनोवैज्ञानिक असुरक्षा से।
पहली उपयोगी है।
दूसरी अंतहीन है।
यहीं वह क्षेत्र आरम्भ होता है जहाँ तर्क की सीमाएँ दिखाई देने लगती हैं।
क्योंकि अंततः यह किसी तकनीक का विषय नहीं है।
यह प्रेम का विषय है।
“ये तो प्रेम की बात है उधो।”
प्रेम में मन का नियंत्रण शिथिल पड़ता है।
प्रेम में व्यक्ति स्वयं को लगातार स्थापित करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करता।
प्रेम में घटने का साहस आता है।
और जहाँ घटने का साहस आता है, वहाँ ठहराव संभव होता है।
घटने की दिशा
समूची समस्या को एक संरचना में संक्षेपित किया जा सकता है:
असुरक्षा → अधिक बनने की इच्छा → अहंकार की वृद्धि → संघर्ष
अवलोकन → ठहराव → अहंकार का क्षय → सहज कर्म
मनुष्य सामान्यतः मानता है कि मुक्ति किसी उपलब्धि का नाम है।
परंतु संभव है कि मुक्ति किसी उपलब्धि का नहीं, बल्कि एक बोझ के उतर जाने का नाम हो।
संभव है कि सही कर्म किसी प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि स्पष्टता का स्वाभाविक फल हो।
संभव है कि जीवन की अनेक समस्याएँ इसलिए बनी रहती हैं क्योंकि हम उन्हें लगातार हिलाते रहते हैं।
जिस प्रकार जल को स्वच्छ होने के लिए शांत छोड़ना पड़ता है, उसी प्रकार मन को भी कभी-कभी अपने ही हस्तक्षेप से मुक्त करना पड़ता है।
तब जो प्रकट होता है, वह न निष्क्रियता है, न भाग्यवाद।
वह एक ऐसी स्थिति है जिसमें कर्म होता है, पर कर्ता का बोझ नहीं होता; निर्णय होते हैं, पर मानसिक संघर्ष नहीं होता; जीवन चलता है, पर उसे लगातार धक्का देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
यहीं ताओ का ठहराव धर्म की घटने वाली दिशा से मिल जाता है।
और तब स्पष्ट होता है कि जीवन की सबसे बड़ी समस्या शायद यह नहीं है कि हम पर्याप्त नहीं कर रहे।
संभवतः समस्या यह है कि हम आवश्यकता से अधिक कर रहे हैं।
जहाँ कुछ और जोड़ने की आवश्यकता नहीं है, वहाँ भी हम जोड़ते जा रहे हैं।
जबकि सत्य की दिशा अक्सर जोड़ने में नहीं, बल्कि हटने में खुलती है।
वृद्धि की नहीं, क्षय की।
अधिक बनने की नहीं, कम होने की।
और अंततः उसी घटने में वह स्थान प्रकट होता है जहाँ सही कर्म स्वयं उपस्थित हो जाता है।