अवधूत गीता — जहाँ मैं नहीं, वहीं शिव
(अवधूत गीता के आधार पर — सरल और सीधी समझ)
यह चर्चा अवधूत गीता के कुछ श्लोकों (1.27, 4.1, 6.8, 6.17, 6.22, 6.25) पर आधारित है। इसकी दृष्टि वही है जो अष्टावक्र गीता और ऋभु गीता में मिलती है—सीधी, अद्वैत और अहंकार-भेदी।
यह कोई कर्मकांड सिखाने वाला ग्रंथ नहीं है। यह जानने, मानने और करने की पूरी मानसिक संरचना पर प्रश्न खड़ा करता है।
1. “शिवं न जानामि…” — जानना ही द्वैत है
अवधूत गीता 1.27
शिवं न जानामि कथं वदामि
शिवं न जानामि कथं भजामि ।
अहं शिवस्वरूपपरमार्थतत्त्वं
समस्वरूपं गगनोपमं च ॥अनुवाद:
मैं शिव को नहीं जानता तो कैसे उसका वर्णन करूँ,
मैं शिव को नहीं जानता तो कैसे उसे भजूँ,
मैं ही शिव स्वरूप एवं परमार्थ तत्व हूँ,
जो गगन के तुल्य और सम स्वरूप है ॥
यहाँ पहली चोट “जानने” पर है।
“जानना” हमेशा दो बनाता है—जानने वाला और जिसे जाना जा रहा है।
“शिवं न जानामि कथं वदामि”
शिव को जानना मतलब कोई जानने वाला है और कोई जाना जाने वाला।
जैसे ही “मैं” जानने वाला बना, शिव वस्तु बन गए।
“जिसे तुम जान लो, वह तुमसे अलग हो जाता है।”
और जो अलग है, वह परमार्थ नहीं हो सकता।
इसलिए आरंभ ही “शिवं न” से है — निषेध से।
“शिवं न जानामि कथं भजामि”
भजन भी द्वैत है।
भजने वाला और जिसे भजा जा रहा है — दो।
यदि मैं शिव को भज रहा हूँ, तो शिव मेरे सामने हैं — मेरे बाहर।
यह भी अहंकार का ही एक सूक्ष्म रूप है।
अहंकार भक्त बनकर भी स्वयं को पुष्ट करता है।
“अहं शिवस्वरूपपरमार्थतत्त्वं”
यहाँ घोषणा है —
“यदि मैं निर्मल हूँ, तो मैं ही शिव हूँ।”
जब तक शिव परंपरा, कथा, मूर्ति या कल्पना हैं — तब तक अहंकार सुरक्षित है।
पर जब सब भेद हटते हैं, तब केवल समता बचती है।
“समस्वरूपं गगनोपमं च”
गगन जैसा —
न पक्षधर, न विरोधी।
न राग, न विराग।
कुत्ते और कीड़े के लिए राख और सोना एक है।
मनुष्य ही भेद बनाता है।
समत्व ही शिवत्व है।
2. “नावाहनं नैव विसर्जनं…” — पूजा का अर्थ
अवधूत गीता 4.1
नावाहनं नैव विसर्जनं वा पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति ।
ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति समासं चैव शिवर्चनं च ॥अनुवाद:
सर्वव्यापक चेतन आत्मा का न आवाहन है, न विसर्जन।
उस पर पुष्प-पत्र कैसे चढ़ाए जा सकते हैं?
उसके लिए ध्यान और मंत्र कैसे हो सकते हैं?
सर्वत्र समान दृष्टि रखना ही उस शिव रूप चेतन आत्मा की पूजा है।
यदि चेतना सर्वत्र है, तो उसे बुलाना या विदा करना अर्थहीन है।
पूजा का वास्तविक अर्थ है — समदृष्टि।
“सर्वत्र समान दृष्टि रखना ही शिव की पूजा है।”
अहंकार पूजा करना चाहता है, ताकि वह “भक्त” कहलाए।
पर यहाँ पूजा का अर्थ है — “मैं” हट जाए।
शिव का अलहदपन
शिव को कुछ नहीं चाहिए।
न महल, न आभूषण।
समुद्र मंथन में सब अमृत चाहते थे।
शिव ने अमृत नहीं लिया — विष पिया।
अर्थ स्पष्ट है —
निष्काम रहो, पर जहाँ आवश्यकता हो वहाँ उत्तरदायित्व लो।
अहंकार के बिना कार्य
जब गणित की समस्या हल करते हो, तब पूरा तंत्र काम करता है — पर अहंकार नहीं होता।
जब कलाकार डूब जाता है, तब कला और कलाकार अलग नहीं रहते।
जहाँ ‘मैं’ हटता है, वहाँ उत्कृष्टता आती है।
3. “विदित-अविदित भी असत्य” — ज्ञान पर प्रहार
अवधूत गीता 6.8
गतिताविदितं न हि सत्यमिति विदिताविदितं न हि सत्यमिति ।
यदि चैकनिरतरसर्वशिव विषयेंद्रियबुद्धेर्मनसि कथम् ॥अनुवाद:
ब्रह्म के बारे में जो कहा गया है और जो नहीं कहा गया है — दोनों सत्य नहीं हैं।
जो विदित है और अविदित है — दोनों सत्य नहीं हैं।
यदि वह चेतन नित्य, सर्व एवं शिव रूप एक ही है,
तो ये विषय, इन्द्रियाँ, बुद्धि और मन कैसे हो सकते हैं?
यह कथन बहुत गहरा है।
ज्ञान और अज्ञान—दोनों अहंकार की श्रेणियाँ हैं।
जिस “मैं” को ज्ञान है, वही दूषित है।
इसलिए जो कुछ वह पकड़ेगा, वह विकृत हो जाएगा।
क्यों? क्योंकि जानने वाला ही विकृत है।
अहंकार के माध्यम से जो भी समझा जाएगा, वह अहंकार-रंजित होगा।
जैसे खराब पेट में अच्छा भोजन भी पचता नहीं, वैसे ही अहंकार में सत्य भी विकृत हो जाता है।
“यदि सब एक ही शिव है, तो ‘मैं’ और ‘मेरा’ कैसे?”
यहाँ सीधी चोट है—
जहाँ “मेरा सत्य”, “मेरी अनुभूति”, “मेरा ब्रह्म” है, वहाँ अभी भी ‘मैं’ बचा हुआ है।
4. “त्वमहं न हि…” — भेद का अंत
अवधूत गीता 6.17
यदि मोहविषादविहीनपरो यदि संशयशोकविहीनपरः ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवमहमत्र ममेति कथं च पुनः ॥अनुवाद:
जब वह आत्मा मोह एवं विषाद से रहित इनसे परे है,
यदि वह संशय और शोक से रहित और इनसे परे है,
यदि वह एक ही नित्य, सर्व एवं शिव है,
तो फिर मैं और ‘मेरा’ इस प्रकार का कथन कैसे हो सकता॥अवधूत गीता 6.22
त्वमहं न हि हन्त कदाचिदपि कुलजातिविचारमसत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिनन्दनमत्र करोमि कथम् ॥अनुवाद:
आत्मा में तू और मैं का भेद कदापि नहीं है,
तथा उसमें कुल एवं जाति का विचार भी असत्य ही है।
परमार्थ रूप में मैं ही कल्याणकारी आत्मा हूँ,
फिर मैं किस प्रकार यहाँ अभिनन्दन करूँ॥
“अहमेव शिवः परमार्थ इति — अभिनन्दनमत्र करोमि कथम्?”
यदि मैं ही शिव हूँ, तो अभिनंदन किसका?
किसके आगे झुकूँ?
लोकधर्म कहता है — सबके आगे झुको।
धर्म पूछता है — झुकने वाला है कौन?
“मैं शून्य हूँ।”
और शून्य ही अनंत में मिलता है।
“रांझा रांझा करते-करते रांझा हुआ।”
अनंत बनने से नहीं, शून्य होने से मिलन है।
5. राग-विराग से परे
अवधूत गीता 6.25
सरजो विरजो न कदाचिदपि ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति अभिनन्दनमत्र करोमि कथम् ॥अनुवाद:
वह आत्मा कभी भी राग एवं विराग वाली नहीं है,
निश्चय ही यह निर्मल, निश्चल एवं शुद्ध है।
मैं परमार्थ रूप में वही शिवस्वरूप आत्मा हूँ,
फिर मैं किस प्रकार अभिनन्दन करूँ॥**
आत्मा न रागी है, न विरागी।
वह शुद्ध और निश्चल है।
हम अक्सर विराग को भी उपलब्धि बना लेते हैं।
पर यहाँ कहा गया है—राग और विराग दोनों मन की अवस्थाएँ हैं।
सत्य उनसे परे है।
एक सरल आरेख (अहंकार की संरचना)
अहंकार
↓
मैं और मेरा
↓
भेद (विषय–विषयी)
↓
मोह / शोक / भय
जब “मैं” ढीला पड़ता है—
समता
↓
भेद का लोप
↓
शिवत्व
नाटक — “लहरों के राजहंस” और आंतरिक द्वंद्व
लहरों के राजहंस में नंद का द्वंद्व यही है—न इधर का, न उधर का।
वह कहता है कि मोहिनी खींच रही है।
पर प्रश्न है—खींच कौन रहा है?
मोह बाहर नहीं है;
मोह भीतर की कामना है।
यदि धन, घर, स्त्री न होती—क्या वह लौटता?
तो समस्या मोहिनी नहीं, उसकी अपनी अधूरी आकांक्षा है।
“प्रेम की पहचान सरल है — वह मुक्ति देता है।”
यदि संबंध बाँध रहा है, तो वह प्रेम नहीं, आवश्यकता है।
भेष और वास्तविकता
केश-मुंडन या वस्त्र बदलना आध्यात्मिकता नहीं है।
वह केवल सामाजिक संकेत हो सकता है।
आज की आवश्यकता उलटी है—
भीतर स्पष्टता हो, बाहर सामान्यता।
यदि भीतर सच है, तो अलग दिखने की ज़रूरत नहीं।
कॉर्पोरेट और परिवार
नौकरी में “I belong” का भ्रम।
पर भीतर भय है।
लोकधर्म करियर चुनता है।
मनुष्य जंजीरों में जीता है।
प्रश्न
1. क्या अहंकार पूरी तरह गिर सकता है?
अहंकार धीरे-धीरे भी गिर सकता है, और एक ही आघात में भी।
अक्सर हम दर्द को टालते हैं, इसलिए वह किस्तों में आता है।
“मैं झूठा हूँ” —
यह वाक्य आत्म-निंदा नहीं, आत्म-दर्शन है।
जब तक मैं अपने भ्रम नहीं देखता, तब तक हर रिश्ता विकृत होगा।
2. क्या समाज ही दोषी है?
समाज अंधकारमय हो सकता है।
पर प्रश्न यह है—तुम जहाँ हो, वहाँ दीपक जला या नहीं?
एक कमरे में अंधेरा विशाल हो सकता है,
पर ध्यान एक दीपक पर टिकता है।
ज्ञान इकट्ठा करना पर्याप्त नहीं।
जीना आवश्यक है।
3. जीवन में बात उतरती क्यों नहीं?
क्योंकि हम सुनते हैं, पर करते नहीं।
सत्य कोई रहस्यमय अनुभूति नहीं है।
काम है—तो करो।
नींद पूरी करो, श्रम करो, स्पष्ट रहो।
मन नहीं लग रहा?
किसने कहा मन लगाना ज़रूरी है?
तन लगाओ—मन पीछे आएगा।
आध्यात्मिकता श्रम से भागने का साधन नहीं है।
यह सजग श्रम का नाम है।
समापन
अवधूत गीता का संदेश सीधा है:
- जानना भी बाधा हो सकता है।
- पूजा समता है, क्रिया नहीं।
- ज्ञान और अज्ञान दोनों अहंकार की श्रेणियाँ हैं।
- राग-विराग से परे शुद्ध चेतना है।
“जहाँ मैं नहीं, वहीं शिव है।”
यह वाक्य सिद्धांत नहीं, अभ्यास है।
और अभ्यास का अर्थ है—
हर क्षण अपने “मैं” को पकड़ते हुए देखना,
और जहाँ आवश्यक न हो, वहाँ उसे हट जाने देना।