माने क्या?

अहंकार माने क्या

अहंकार माने क्या?

“अहंकार वह झूठी पहचान है जो ‘मैं’ को शरीर-मन से जोड़ देती है।”

व्याख्या:
अहंकार का शाब्दिक अर्थ है — अहं (मैं) + कार (निर्माण)।
अर्थात् “मैं” की एक बनाई हुई छवि।

जब शुद्ध “मैं हूँ” का बोध शरीर, नाम, रूप, विचार, भूमिका, उपलब्धि, स्मृति या भविष्य से जुड़ जाता है, तब वह अहंकार बन जाता है।

  • “मैं शरीर हूँ”
  • “मैं मन हूँ”
  • “मैं विचार हूँ”
  • “मैं सफल हूँ”
  • “मैं असफल हूँ”

यह सब अहंकार की परतें हैं।

शुद्ध “मैं” तो केवल साक्षी है — लेकिन जब वह प्रकृति (परिवर्तनशील) से तादात्म्य कर लेता है, तब दुख प्रारंभ होता है।


अहंकार की कार्यप्रणाली

“अहंकार = पहचान + तुलना + सुरक्षा की चाह”

व्याख्या:
अहंकार तीन चीज़ों पर टिका है —

  1. पहचान – मैं कौन हूँ? (नाम, पद, धर्म, विचारधारा)
  2. तुलना – मैं दूसरों से कैसा हूँ?
  3. सुरक्षा – मुझे स्थायी होना है।

लेकिन समस्या यह है कि जिस चीज़ से अहंकार जुड़ा है — वह सब परिवर्तनशील है।
इसलिए अहंकार हमेशा असुरक्षित रहता है।


आध्यात्मिक अर्थ

अहंकार = मनोवैज्ञानिक समय

अहंकार अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं से बना है।
वर्तमान क्षण में, जहाँ केवल साक्षी है — वहाँ अहंकार नहीं है।

  • अतीत = “मैंने क्या पाया / खोया”
  • भविष्य = “मुझे क्या पाना है”
  • वर्तमान = केवल “मैं हूँ”

जहाँ केवल “मैं हूँ” है — वहाँ शांति है।
जहाँ “मैं यह हूँ” है — वहाँ अहंकार है।

अहंकार कोई वस्तु नहीं है जिसे नष्ट करना पड़े।
यह केवल एक गलत पहचान है।

जैसे ही पहचान बदलती है — अहंकार स्वयं गिर जाता है।


सार

अहंकार असली “मैं” नहीं है।
वह “मैं” पर चढ़ी हुई एक कहानी है।

जब “मैं” प्रकृति से हटकर अपने शुद्ध साक्षीस्वरूप में स्थापित हो जाता है —
तब अहंकार समाप्त नहीं होता, बल्कि अप्रासंगिक हो जाता है।

अहंकार मिटाने की जरूरत नहीं —
बस उसे पहचान लेने की जरूरत है।