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अहंकार शरीर का मेल है — सत्र 4: “निरखि मत भूल तन गोरा, जगत में जीवना थोरा”

देह, अहं और आत्म-जिज्ञासा की संरचना

देह → अनुभव → पहचान → अहं → विभाजन → दुःख
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                        आत्म-अवलोकन
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                             स्पष्टता

मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन एक ऐसी संरचना पर आधारित है, जिसे वह स्वयं समझे बिना जीता रहता है। इस संरचना का पहला आधार है देह—शरीर। शरीर के माध्यम से अनुभव उत्पन्न होते हैं, अनुभवों से पहचान बनती है, और पहचान से [[अहंकार|अहं]] का जन्म होता है। यही वह मूल बिन्दु है जहाँ से समस्त भ्रम प्रारम्भ होता है।

कहा गया है:

“निरखि मत भूल तन गोरा, जगत में जीवना थोरा।”

यह केवल एक काव्यात्मक वाक्य नहीं, बल्कि एक गहरा बौद्धिक संकेत है। शरीर को देखकर मोहित मत हो जाओ; यह क्षणभंगुर है। परन्तु मनुष्य का समस्त निवेश इसी क्षणभंगुरता में है। वह उसी को स्थायी मानकर जीवन जीता है, जो निरंतर परिवर्तनशील है।

यहीं से भ्रम प्रारम्भ होता है।


अहंकार की उत्पत्ति और उसका स्वरूप

शरीर → अनुभव → “मैं हूँ” → “मैं यह हूँ” → “मैं वह नहीं हूँ” → विभाजन

अहंकार कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है; यह शरीर के साथ उत्पन्न होने वाली एक मानसिक संरचना है। जब तक शरीर है, तब तक “मैं हूँ” का बोध रहेगा। परंतु यह “मैं हूँ” शुद्ध अस्तित्व का बोध नहीं रहता; यह शीघ्र ही “मैं यह हूँ” में परिवर्तित हो जाता है—और इसी के साथ “मैं वह नहीं हूँ” का द्वैत भी उत्पन्न होता है।

यहीं विभाजन है।

अहंकार को शरीर का “मेल” कहा गया है। यह तुलना अत्यंत सटीक है। जैसे शरीर पर जमा हुआ मैल न तो शरीर के लिए उपयोगी है, न ही उसका कोई वास्तविक मूल्य है, वैसे ही अहंकार भी अस्तित्व के लिए अनावश्यक है। आँख, हाथ, हृदय—ये सभी शरीर के लिए आवश्यक हैं। इनके बिना जीवन असंभव है। परंतु मैल का होना या न होना शरीर के अस्तित्व को प्रभावित नहीं करता।

अहंकार भी वैसा ही है—अनावश्यक, परंतु उपस्थित

यहाँ एक सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है। मैल पूरी तरह बाहरी नहीं है; वह शरीर की प्रक्रियाओं और बाहरी तत्वों के सम्मिलन से बनता है। उसी प्रकार अहंकार भी केवल बाहरी नहीं है; यह अनुभवों, स्मृतियों, सामाजिक प्रभावों और शरीरगत पहचान के मिश्रण से उत्पन्न होता है।

इसलिए जब कहा जाता है कि अहंकार व्यर्थ है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह कहीं बाहर से आया हुआ शत्रु है। वह शरीर के साथ ही उत्पन्न हुई एक त्रुटि है।


अहंकार का विस्तार और विकृति

अहं → स्वामित्व → नियंत्रण → विकृति → दुःख

अहंकार का स्वभाव केवल उत्पन्न होना नहीं है; उसका स्वभाव है विस्तार। वह स्वयं को स्थापित करने के लिए शरीर पर अधिकार कर लेता है। जो शरीर केवल एक जैविक प्रक्रिया था, वह “मेरा शरीर” बन जाता है।

यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

“शरीर” एक तथ्य है।
“मेरा शरीर” एक मानसिक निर्माण है।

यहीं से अहंकार शरीर का पहला शिकार बनाता है। बाहरी संसार को पकड़ने से पहले वह भीतर के साधन—शरीर—को ही अपने अधीन कर लेता है।

इसके बाद वह शरीर की स्वाभाविक प्रक्रियाओं को विकृत करता है।

उदाहरण स्पष्ट है:

  • शरीर को भोजन चाहिए → पोषण के लिए
  • अहंकार को स्वाद चाहिए → पूर्णता के भ्रम के लिए

जीभ का कार्य पेट की रक्षा करना है, परंतु अहंकार उसे भोग का साधन बना देता है। शरीर संतुलन चाहता है; अहंकार अति चाहता है। इसी कारण मनुष्य या तो अत्यधिक मोटा होता है या अत्यधिक दुर्बल—दोनों ही स्थितियाँ शरीर की नहीं, अहंकार की विकृति हैं।

यहाँ एक गहरी संरचना कार्य कर रही है:

  1. अहंकार स्वयं को अधूरा अनुभव करता है
  2. अधूरापन उसे पूर्णता की खोज में धकेलता है
  3. वह बाहरी वस्तुओं में पूर्णता खोजता है
  4. प्रत्येक प्राप्ति के बाद भी अधूरापन बना रहता है

इस प्रकार कामनाओं का अंतहीन चक्र चलता है।


आत्म-जिज्ञासा: एकमात्र केंद्रीय प्रश्न

ज्ञान की इच्छा → जानने वाला → प्रश्न → कोहम

मनुष्य अनेक प्रश्न पूछता है—धन, संबंध, करियर, समाज, धर्म। परंतु इन सभी प्रश्नों में एक मूलभूत त्रुटि है: प्रश्न पूछने वाले को ही नहीं जाना गया है

इसीलिए सम्पूर्ण [[अध्यात्म]] का केंद्र केवल एक प्रश्न है—[[कोहम]]

यह प्रश्न किसी बौद्धिक जिज्ञासा का विषय नहीं है; यह अस्तित्वगत स्पष्टता का प्रश्न है। यदि यह स्पष्ट नहीं है कि “मैं कौन हूँ”, तो कोई भी अन्य ज्ञान स्थिर नहीं हो सकता।

उदाहरण सरल है। यदि किसी व्यक्ति को यह न पता हो कि वह कहाँ है, तो वह कहीं भी पहुँच जाए, उसे लगेगा कि वह भटक गया है। उसी प्रकार, जब तक “मैं” की पहचान स्पष्ट नहीं होती, तब तक जीवन की दिशा भी अस्पष्ट रहती है।

इस संदर्भ में कहा गया है कि अन्य सभी धार्मिक क्रियाएँ—तीर्थ, व्रत, परंपराएँ—केवल बाहरी आवरण हैं। यदि वे आत्म-जिज्ञासा की ओर नहीं ले जातीं, तो उनका कोई मौलिक मूल्य नहीं है।


अहंकार और पूर्णता का भ्रम

अपूर्णता का बोध → कामना → प्राप्ति → असंतोष → पुनः कामना

अहंकार का मूल अनुभव है अपूर्णता। वह स्वयं को पर्याप्त नहीं मानता, इसलिए वह निरंतर कुछ प्राप्त करने की चेष्टा करता है। यह प्राप्ति कभी वस्तुओं के रूप में होती है, कभी संबंधों के रूप में, और कभी उपलब्धियों के रूप में।

परंतु यहाँ एक बुनियादी त्रुटि है।

अपूर्णता यदि अहंकार की संरचना में ही निहित है, तो बाहरी वस्तुएँ उसे कैसे पूर्ण कर सकती हैं?

इसलिए हर प्राप्ति के बाद भी एक सूक्ष्म असंतोष बना रहता है। यह असंतोष ही आगे की कामनाओं को जन्म देता है। इस प्रकार जीवन एक अंतहीन चक्र में बदल जाता है।

यह चक्र ही बंधन है।


देह और मृत्यु का मिथ्याभास

निरंतर परिवर्तन → सूक्ष्म मृत्यु → अहं का स्थायित्व-भ्रम → भय

शरीर प्रत्येक क्षण बदल रहा है। कोशिकाएँ नष्ट हो रही हैं, नई बन रही हैं। इस अर्थ में शरीर प्रत्येक क्षण “मर” रहा है। परंतु अहंकार इस निरंतर परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता। वह केवल अंतिम क्षण को “मृत्यु” कहता है।

यह एक बौद्धिक त्रुटि है।

अहंकार स्वयं अस्थिर है, परंतु वह स्थायित्व का भ्रम बनाए रखना चाहता है। इसी कारण वह मृत्यु से भयभीत रहता है। यदि वह यह देख ले कि परिवर्तन निरंतर है, तो उसका भय समाप्त हो सकता है।

परंतु अहंकार ऐसा नहीं करता, क्योंकि उसका अस्तित्व ही इस भ्रम पर आधारित है।


अहंकार और कर्तृत्व का भ्रम

अहं → “मैं करता हूँ” → नियंत्रण का भ्रम → तनाव

मनुष्य यह मानकर चलता है कि वह संसार को चला रहा है। यह धारणा अहंकार की सबसे सूक्ष्म और गहरी अभिव्यक्ति है। वास्तव में समस्त प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चल रही है—नदियाँ बह रही हैं, पेड़ बढ़ रहे हैं, ग्रह घूम रहे हैं।

मनुष्य का नियंत्रण अत्यंत सीमित है, परंतु उसका अहं उसे यह विश्वास दिलाता है कि वह सब कुछ संचालित कर रहा है।

यही कर्तृत्व का भ्रम है।

जब यह भ्रम टूटता है, तो एक नई समझ उत्पन्न होती है—कुछ करने की आवश्यकता नहीं है, केवल देखने की आवश्यकता है। यह निष्क्रियता नहीं है; यह अनावश्यक हस्तक्षेप का समाप्त होना है।

उदाहरण के रूप में, जब मानव हस्तक्षेप कम हुआ (जैसे महामारी के समय), तो प्रकृति ने स्वयं को संतुलित कर लिया। नदियाँ साफ हुईं, वायु शुद्ध हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या प्रकृति में नहीं, मानव के हस्तक्षेप में है—जो अहंकार द्वारा प्रेरित है।


आत्म-अवलोकन: त्रुटि का एकमात्र समाधान

त्रुटि → पहचान → आत्म-अवलोकन → स्पष्टता → शिथिलता

अहंकार एक त्रुटि है, और त्रुटि का समाधान किसी क्रिया से नहीं, बल्कि देखने से होता है। यदि किसी व्यक्ति को यह भ्रम हो कि उसके तीन आँखें हैं, तो इसका समाधान कोई औषधि नहीं है—बल्कि एक दर्पण है।

इसी प्रकार, अहंकार का समाधान है [[आत्म-अवलोकन]]

यह अवलोकन बाहरी नहीं, आंतरिक है। इसमें व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को ईमानदारी से देखता है। यह ईमानदारी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अहंकार स्वयं को छिपाने में निपुण होता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बिंदु उभरता है:

ईमानदारी ही [[प्रेम]] है।

जब व्यक्ति बिना विकृति के देखता है, बिना बचाव के स्वीकार करता है, तो वही प्रेम की वास्तविक अभिव्यक्ति है। प्रेम कोई भावना नहीं, बल्कि सत्य के प्रति पूर्ण खुलापन है।


विचार, भावना और “मेरेपन” की समस्या

विचार → “मेरा विचार” → पहचान → संघर्ष
भावना → “मेरी भावना” → स्वामित्व → आसक्ति

विचार और भावना अपने आप में समस्या नहीं हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब उन पर “मेरेपन” का आरोपण होता है।

  • विचार होना स्वाभाविक है
  • “मेरा विचार” बनाना अहंकार है

इसी प्रकार:

  • भावना होना स्वाभाविक है
  • “मेरी भावना” बनाना आसक्ति है

जहाँ “मेरा” आता है, वहाँ विभाजन आता है। और जहाँ विभाजन है, वहाँ प्रेम संभव नहीं है। प्रेम का अर्थ ही है—अस्वामित्व


समाज, परवरिश और अहंकार की पुनरावृत्ति

अहं → व्यवहार → वातावरण → अगली पीढ़ी → पुनरावृत्ति

अहंकार केवल व्यक्तिगत नहीं है; यह सामाजिक संरचना में भी व्याप्त है। माता-पिता, समाज, शिक्षा—सभी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें अहंकार पुनः उत्पन्न होता है।

बच्चे स्वाभाविक रूप से खुले होते हैं। उनमें जिज्ञासा होती है, ग्रहणशीलता होती है। परंतु जब उन्हें एक प्रदूषित वातावरण मिलता है—स्वार्थ, झूठ—तो वे उसी को आत्मसात कर लेते हैं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत होता है:

क्या करना है से अधिक महत्वपूर्ण है—क्या नहीं करना है।

यदि वातावरण शुद्ध हो, तो बच्चा स्वाभाविक रूप से विकसित होगा। जैसे शुद्ध वायु में श्वास लेना सहज है, वैसे ही शुद्ध मानसिक वातावरण में विकास सहज है।


विकास, आधुनिकता और अहंकार

अहं → असंतोष → विकास की चाह → प्रकृति पर आक्रमण → असंतुलन

आधुनिक समाज “विकास” को एक परम मूल्य मानता है। परंतु यह प्रश्न कम ही पूछा जाता है कि विकास किसके लिए है?

प्रकृति को विकास की आवश्यकता नहीं है। नदियाँ, जंगल, पर्वत—ये सब अपने आप में पूर्ण हैं। विकास की माँग केवल अहंकार करता है, क्योंकि वह स्वयं को अधूरा अनुभव करता है।

इसलिए विकास का अधिकांश प्रयास प्रकृति के विरुद्ध होता है। जंगल काटे जाते हैं, नदियाँ प्रदूषित होती हैं, और इसे प्रगति कहा जाता है।

यह एक गहरी विडम्बना है।

एक छोर पर आदिवासी है—जिसमें अहंकार न्यून है, परंतु आत्मज्ञान भी स्पष्ट नहीं है। दूसरे छोर पर आधुनिक मनुष्य है—जो स्वयं को शिक्षित कहता है, परंतु उसका अहंकार अत्यधिक विकसित है। यही कारण है कि वह प्रकृति का शोषण करता है और उसे नष्ट करता है।


समेकन: संरचना की पूर्ण समझ

शरीर → पहचान → अहं → अपूर्णता → कामना → विकृति → दुःख
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                              कोहम
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                            आत्म-अवलोकन
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                              स्पष्टता

सम्पूर्ण विवेचन को एकीकृत करने पर एक स्पष्ट संरचना उभरती है।

शरीर से पहचान उत्पन्न होती है, पहचान से अहंकार, और अहंकार से विभाजन। विभाजन अपूर्णता का अनुभव उत्पन्न करता है, जो कामनाओं में परिवर्तित होता है। कामनाएँ विकृति को जन्म देती हैं, और अंततः यह सब दुःख में परिणत होता है।

इस संरचना का समाधान किसी बाहरी क्रिया में नहीं है। समाधान है—देखना

जब “मैं कौन हूँ” का प्रश्न गंभीरता से उठता है, और जब आत्म-अवलोकन ईमानदारी से किया जाता है, तब यह पूरी संरचना स्पष्ट होने लगती है। स्पष्टता के साथ ही अहंकार की पकड़ शिथिल होती है।

यह कोई उपलब्धि नहीं है।
यह एक त्रुटि का समाप्त होना है।

और जहाँ त्रुटि समाप्त होती है, वहाँ जो शेष रहता है—वही सत्य है।

  • [[शून्यता सप्तति छंद 31 — कोहम अहं की जाँच में उत्पत्ति, स्थित और विनाश का लय]]
  • [[मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमे हैं]]