आत्मज्ञान
प्रकृति = परिवर्तनशील
मन = परिवर्तन से तादात्म्य
तादात्म्य = अस्थिरता = दुःख
आत्मा = जो परिवर्तन से अछूता है = सनातन
धर्म = मन की पहचान को परिवर्तन से हटाकर
सनातन में स्थापित करना
परिभाषा
आत्मज्ञान स्वयं के सत्य स्वरूप ([[आत्मा]]) का प्रत्यक्ष बोध है।
क्या नहीं है
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यह सूचना नहीं है
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यह बौद्धिक संग्रह नहीं है
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यह मान्यता नहीं है
क्या है
यह जानना कि “मैं” कौन नहीं हूँ।
अहं के गलने के बाद जो शेष रहता है, वही आत्मज्ञान का क्षेत्र है।
परिणाम
कर्तापन शिथिल होता है।
भीतर स्थिरता आती है।
सार
आत्मज्ञान जानने की प्रक्रिया का अंत है।