आत्मविसर्जन

प्रेम का चरम रूप आत्मविसर्जन है।

मूल विचार
[[महाप्रेम]] = [[आत्मविसर्जन]]
सच्चा प्रेम “मैं” को बचाता नहीं, विलीन करता है।

व्याख्या
साधारण प्रेम स्वामित्व चाहता है।
परंतु गहन प्रेम स्वयं को अर्पित कर देता है।
ज्ञान में यह अहं-विलय के रूप में प्रकट होता है,
भक्ति में पूर्ण समर्पण के रूप में।

मुख्य बिंदु

  • प्रेम बिना त्याग अधूरा है

  • आत्मविसर्जन भय नहीं, विस्तार है

  • द्वैत प्रेम का आरंभ है, अद्वैत उसका चरम

  • “मैं” का अंत ही मिलन है

एक पंक्ति सार
जहाँ “मैं” मिटता है, वहीं प्रेम पूर्ण होता है।

संबंधित अवधारणाएँ
[[अद्वैत]]
[[भक्ति]]
[[ज्ञान]]