माने क्या?

आत्मा माने क्या

आत्मा माने क्या?

“आत्मा वह है जो प्रकृति के परे है — कल्पना, वचन, मन और बुद्धि से भी परे।
जो सनातन है।
सत्य जिसकी ओर वेद इशारा करते हैं।
‘नेति-नेति’ में जो आखिर में बचता है।”

व्याख्या:
आत्मा कोई वस्तु नहीं है।
उसे देखा, छुआ, या सोचा नहीं जा सकता।

जो देखा जा सकता है — वह प्रकृति है।
जो सोचा जा सकता है — वह मन है।
जो समझा जा सकता है — वह बुद्धि है।

आत्मा इन सबकी साक्षी है,
पर इनमें से कोई नहीं है।

“नेति-नेति” — यह नहीं, यह नहीं।
शरीर नहीं।
मन नहीं।
विचार नहीं।
भावना नहीं।

जब सब नकार दिए जाते हैं,
तो जो न नकारा जा सके — वही आत्मा है।


आत्मा की प्रकृति

आत्मा जन्म नहीं लेती।
आत्मा मरती नहीं।
वह समय में घटित नहीं होती।

वह परिवर्तन की साक्षी है,
पर स्वयं अपरिवर्तनशील है।

वह अनुभव का विषय नहीं,
अनुभव का आधार है।


आध्यात्मिक अर्थ

आत्मा को पाना नहीं है,
क्योंकि वह कभी खोई नहीं।

जब [[अहंकार]] गिरता है,
जब [[मन]] शांत होता है,
जब [[माया]] की पकड़ ढीली पड़ती है —

तब आत्मा प्रकट नहीं होती,
बल्कि स्पष्ट हो जाती है।

आत्मा कोई उपलब्धि नहीं,
बल्कि वास्तविक पहचान है।


सार

आत्मा वह है —
जो कभी बदलती नहीं,
कभी टूटती नहीं,
कभी जन्मती या मरती नहीं।

सब कुछ आता-जाता है।
आत्मा सदा रहती है।

“नेति-नेति” के बाद
जो मौन शेष रह जाए —
वही आत्मा है।