AVALOKAN BASIC WISDOM

आप सच में क्या चाहते हैं? एक ईमानदार जाँच — व्यवहारिक वेदांत भाग 2

प्रसंग: संकट, गुरु और एक सरल प्रयोग

स्वामी विवेकानंद के पिता के देहांत के बाद परिवार पर अचानक आर्थिक संकट आ गया। वे शोक और चिंता में थे। तब रामकृष्ण परमहंस ने उनसे कहा—काली माँ के मंदिर में जाओ और जो चाहो माँग लो; सब मिलेगा।

वे कई बार गए, पर हर बार बिना कुछ माँगे लौट आए। भीतर जाते ही वे अपनी मांग भूल जाते थे। यह भूल साधारण भूल नहीं थी; यह एक संकेत था। गुरु ने कोई चमत्कार नहीं किया—उन्होंने एक आत्मिक प्रयोग कराया।


“जो तुम समझते हो कि चाहिए, वह तुम्हें चाहिए ही नहीं।”

इस प्रयोग का अर्थ स्पष्ट है: हमारी घोषित इच्छाएँ अक्सर हमारी वास्तविक चाह नहीं होतीं।

  • हम कहते हैं—पैसा चाहिए।
  • पर भीतर की गहराई में हमें शांति चाहिए।
  • हम कहते हैं—प्रतिष्ठा चाहिए।
  • पर भीतर हमें स्वीकार और पूर्णता चाहिए।

विवेकानंद यदि सचमुच धन चाहते, तो माँग लेते। अवसर था, आश्वासन था। पर माँ के सामने पहुँचकर जो मिला, वह मांग से बड़ा था—सामीप्य। जब मूल मिल जाए, तो गौण याद नहीं रहता।


माँ का अर्थ: प्रतीक और सत्य

यहाँ “माँ” कोई सीमित मूर्ति नहीं, बल्कि एक संकेत है—परम शांति, एकत्व, मौन।

“जब पूरा मिल गया, तो छोटे सिक्के कौन माँगे?”

जब भीतर तृप्ति का अनुभव हो, तो बाहरी वस्तुओं की सूची अर्थहीन हो जाती है।


त्याग नहीं, परिपूर्णता

बाहर से देखने वाले कह सकते हैं—विवेकानंद ने त्याग किया।
पर सत्य यह है: त्याग तब होता है जब कुछ चाहकर छोड़ा जाए।
यहाँ तो चाह ही बदल गई।

सामान्य धारणा वास्तविक स्थिति
त्याग = इच्छाओं को दबाना तृप्ति = इच्छाएँ स्वतः गिर जाना
आध्यात्मिक व्यक्ति संघर्ष करता है आध्यात्मिक व्यक्ति भूल जाता है
समस्या हल की समस्या अप्रासंगिक हो गई

“समस्या हल नहीं हुई; वह याद से उतर गई।”

जब स्मृति का बोझ हटता है, तो वस्तुएँ वहीं रहती हैं, पर उनका अर्थ बदल जाता है। यही “संसार से अलग होना” है—संसार मिटता नहीं, उसका प्रभाव मिटता है।


भूल जाने का रहस्य

आध्यात्मिकता का सार किसी उपलब्धि में नहीं, बल्कि एक प्रकार की भूल में है—
जो अनावश्यक है, वह याद ही नहीं रहता।

  • दुख है या नहीं?
  • सुख है या नहीं?
  • पता नहीं।

क्यों? क्योंकि “मैं” जो हर चीज़ को पकड़कर बैठा था, वही ढीला पड़ गया।

“अपनी खबर हो तो जग की खबर रखे।”

जब तक स्वयं की पहचान स्पष्ट न हो, तब तक बाहरी संग्रह व्यर्थ है।


साधन और साध्य का भ्रम

हम जीवन में साधनों को साध्य बना लेते हैं।
हम जिन चीज़ों को पकड़ते हैं, वे अक्सर साधन होती हैं—मंज़िल नहीं।

साधन असली चाह भ्रम
पैसा शांति पैसा = शांति
संबंध पूर्णता व्यक्ति = अंतिम आश्रय
उपलब्धि मूल्यबोध उपलब्धि = आत्ममूल्य

कोई पुल पर घर नहीं बनाता; पुल पार जाने के लिए होता है। पर हम पुल पर ही बस जाते हैं।


पत्थर और पंख

हम सोचते हैं—यह व्यक्ति, यह वस्तु, यह स्थिति हमें उड़ाएगी।
पर कई बार वह पत्थर होती है।

“जिसे पंख समझा था, वह बोझ निकला।”

पंख पत्थर
जो हल्का करे जो बोझ बढ़ाए
जो स्वतंत्र करे जो निर्भर बनाए
जो भीतर शांति दे जो निरंतर चिंता दे

दो लोग एक-दूसरे से आशा रखते हैं कि दूसरा उन्हें उड़ा देगा।
दोनों बँधे रहते हैं।
न उड़ान मिलती है, न डूबना रुकता है।


परमात्मा की स्मृति?

परमात्मा को याद रखने की आवश्यकता नहीं; वह अनुपस्थित नहीं है। समस्या यह है कि हम अनावश्यक चीज़ों को पकड़े हैं।

“समस्या यह नहीं कि सत्य याद नहीं; समस्या यह है कि असत्य याद है।”

जो बीत चुका है, जिसे मर जाना चाहिए था, उसे हम स्मृति के वेंटिलेटर पर रखे हैं।


मूल इच्छा की पहचान

मनुष्य हजार इच्छाएँ करता है, पर गहराई में एक ही मूल चाह है—पूर्णता।

यह पूर्णता किसी नाम, रूप, व्यक्ति या वस्तु में सीमित नहीं।
यदि उसका नाम-रूप होता, तो वह भी सीमित होता—और सीमित वस्तु मुक्ति नहीं दे सकती।

इसलिए प्रश्न “वह कहाँ है?” व्यर्थ है।
वह वहीं है जहाँ तुम हो।


आत्म-परीक्षण

जीवन का एक ही गंभीर प्रश्न है:

“क्या मैं ठीक जी रहा हूँ?”

  • क्या निर्भरता घटी?
  • क्या भय कम हुआ?
  • क्या भ्रम टूटे?

यदि नहीं, तो जीवन केवल संग्रह और दोहराव है।


सार

  • वास्तविक चाह प्रायः छिपी रहती है।

  • गुरु उसे उजागर करने का अवसर देता है।

  • जब मूल मिल जाए, गौण स्वतः गिर जाता है।

  • त्याग प्रयास नहीं; तृप्ति का परिणाम है।

  • साधन को साध्य मत बनाओ।

  • अपनी मूल इच्छा को पहचानो—उसी के लिए जीवन है।

यही शिक्षा उस प्रसंग में दी गई थी—इच्छाओं की भीड़ के नीचे दबे हुए उस एक सत्य को देखने की।