कठोपनिषद - 1.2.17 — क्यों ब्रह्म आश्रय ही श्रेष्ठ है?
कठोपनिषद - 1.2.17 श्लोकः
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥17॥अन्वय: एतत् = यही; श्रेष्ठम् = श्रेष्ठ; आलम्बनम् = आलम्बन (है); एतत् = यही; परम् = परम; आलम्बनम् = आलम्बन (है); एतत् = इस; आलम्बनम् = आलम्बन को; ज्ञात्वा = जानते हुए (मनुष्य) ; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोक में; महीयते = प्रतिष्ठित होते हैं
अनुवाद: यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही परम आलम्बन है। इस आलम्बन को जानते हुए मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होते हैं।
श्रेष्ठ आलम्बन का प्रश्न: आश्रय किस पर?
बाहर आश्रय → अस्थिरता
स्व-अहं आश्रय → छिपी हुई गुलामी
ब्रह्म आश्रय → स्वतंत्रता
कठोपनिषद (१.२.१७) में कहा गया है —
“एतदालम्बनं श्रेष्ठम्, एतदालम्बनं परम्।”
अर्थात् यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही परम आलम्बन है। और जो इस आलम्बन को जान लेता है, वह ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।
यहाँ प्रश्न सीधा है पर गहरा है — मनुष्य किस पर टिके? किस पर निर्भर हो? किसे अपना आधार बनाए? सामान्य जीवन में हम अनेक प्रकार के आश्रयों पर टिके रहते हैं — परिवार, समाज, विचारधारा, प्रतिष्ठा, ज्ञान, सत्ता, यहाँ तक कि अपनी निजी मान्यताओं पर भी। पर उपनिषद यह संकेत कर रहे हैं कि ऐसा कोई आलम्बन है जो न केवल श्रेष्ठ है बल्कि परम है — अंतिम और निर्विकल्प।
सामान्यतः मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र समझता है। वह कहता है — “मैं अपनी सुनूँगा।” पर यह “अपनी” क्या है? यदि “अपनी” से तात्पर्य अहं है, तो पहले यह समझना होगा कि अहं कोई स्थिर मानसिक बिंदु नहीं है। वह एक दायरा है, एक फैलाव है, एक संभावना-क्षेत्र है जो जमीन से आसमान तक फैला हुआ है। वह किसी भी ऊँचाई पर स्थित हो सकता है।
जिस ऊँचाई पर वह होता है, उसी के अनुरूप उसके पास विषय होते हैं। और एक सूक्ष्म नियम काम करता है — जो भी विषय अहं के पास होता है, वह उसे अपने नीचे रखता है।
अर्थात् वह विषय से पहचान बनाता है, फिर स्वयं को उससे ऊपर स्थापित करता है। यही कारण है कि बोध-ग्रंथ कहते हैं — किसी पर निर्भर मत हो जाओ। क्योंकि आप अपने ही स्तर के लोग और विषय चुनते हैं, और वे आपको आपके स्तर पर ही स्थिर रखेंगे।
अध्यात्म विषयों को अच्छा-बुरा नहीं कहता। एक ही विषय किसी के लिए ऊँचाई हो सकता है। पर यदि आप उसे निचलेपन से पकड़ते हैं, तो वह आपको नीचे ही रोकेगा।
यहाँ मूल प्रश्न विषय का नहीं, अहं के स्तर का है।
[[अहंकार|अहं]] का पिरामिड: भारी आधार, सूक्ष्म शिखर
▲ (सूक्ष्म विवेक)
/ \
/___\
/ \ (विचारधारा, बौद्धिक अहं)
/_______\
/ \ (राय, तुलना, मान्यता)
/___________\
/ \ (मान-सम्मान, उपभोग, सुरक्षा)
/_______________\
यदि अहं का दृश्य-रूपक बनाया जाए तो वह पिरामिड जैसा है—आधार अत्यंत विशाल, शिखर अत्यंत छोटा।
हमारा अधिकांश जीवन निचली परतों में व्यतीत होता है। यदि कोई व्यक्ति 80 वर्ष जीवित रहे, तो 3–4 घंटे की सूक्ष्मता छोड़ दें, शेष समय वह अपनी ही हस्ती के निचले तल पर पाया जाएगा।
क्यों? क्योंकि हमें नीचे “चिजु” मिलती हैं—और हम उन्हें छोड़ना नहीं चाहते।
इसीलिए शिक्षा दी जाती है—“विषय छोड़ दो।” पर यहीं एक गहरी समस्या उत्पन्न होती है।
विषय-त्याग या अहंकार-त्याग?
विषय-त्याग → बाहरी परिवर्तन
अहंकार-त्याग → आंतरिक विसर्जन
अध्यात्म विषय-त्याग की बात नहीं करता; वह [[अहंकार]]-त्याग की बात करता है।
विषय त्याग इसलिए सुझाया गया था क्योंकि वे विषय हमारी बेहोशी के चुनाव थे। पर यदि बेहोशी थोड़ी हट जाए और अहं का ढाँचा जस का तस रहे, तो व्यक्ति अपनी ही अनुगूँज सुनने लगेगा।
वह कहेगा, “मैं स्वतंत्र हूँ।”
पर वह निचले तल की ही सुन रहा होगा।
| सतही समझ | गहरी समझ |
|---|---|
| किसी की मत सुनो | निचली आवाज़ से सावधान रहो |
| विषय छोड़ो | अर्थ बदलो |
| मैं आज़ाद हूँ | मैं किस तल से बोल रहा हूँ? |
बाहर की गुलामी दिखती है; भीतर की नहीं।
और जब गुलामी स्वतंत्रता जैसी दिखे, तो कौन उससे लड़ेगा?
“किसी की मत सुनो” — एक खतरनाक आधा-सत्य
बाहरी निर्भरता छोड़ी
↓
“अपनी सुनो”
↓
निचली परत सक्रिय
↓
सूक्ष्म अहं-विस्तार
दूसरों की सुनना → लोकधर्म
किसी की न सुनना → अहंधर्म
ब्रह्म को सुनना → आत्माधर्म
लोक-शिक्षा कहती है: “सबकी सुनो।”
नया क्रांतिकारी कहता है: “किसी की नहीं सुननी, अपनी सुनो।”
दोनों कथन अधूरे हैं। यदि मनुष्य अपने निचले तल पर है, तो “अपनी सुनना” उसे और नीचे ले जाएगा। इसीलिए उपनिषद कहता है — ब्रह्म पर आश्रित हो जाओ। यहाँ आश्रय का अर्थ बाहरी सत्ता पर निर्भरता नहीं है। “आत्मा ही ब्रह्म है।” अतः ब्रह्म का आश्रय लेना अपनी उच्चतम संभावना का आश्रय लेना है। अहं की ऊँचाई पर जब वह शून्य के निकट पहुँचता है, वही आत्मा है, वही ब्रह्म है।
| सिद्धांत | गलत समझ |
|---|---|
| किसी पर अंध-निर्भर मत हो | किसी की मत सुनो |
| ब्रह्म पर आश्रित हो | अपने निचले मन पर आश्रित हो जाओ |
जब कहा जाता है — “ब्रह्म का आश्रय लो”, तो इसका अर्थ है कि अहं को मिटना होगा। क्योंकि बिना मिटे ब्रह्म का आश्रय नहीं लिया जा सकता। यदि आप कहते हैं — “मैं किसी के आगे नहीं झुकूँगा”, तो आप अंततः अपने ही आगे झुकेंगे।
बाहरी शत्रु बनाम भीतरी शत्रु
बाहरी अन्याय → 20%
भीतरी अज्ञान → 80%
एक समय था जब राजा, परंपरा, सामाजिक ढाँचे स्पष्ट शोषक थे। तब बाहरी विद्रोह आवश्यक था। पर आज स्थिति बदल चुकी है। आज अधिकांश बंधन भीतर हैं।
यदि 80% समस्या भीतर है और 20% बाहर, और हम सारा ध्यान 20% पर केंद्रित रखें, तो भीतर का 80% और मजबूत हो जाएगा।
हम कहते हैं — “कुछ गलत हो रहा है।” प्रश्न है — कहाँ? यदि बाहर ही सब गलत है तो बाहर वालों को शक्ति कौन देता है? वोट कौन करता है? उपभोग कौन करता है? समर्थन कौन देता है?
अध्यात्म इसलिए भीतर की बात करता है। बाहर की गुलामी से भी बड़ी गुलामी भीतर की है। और जब भीतर की गुलामी टूटती है, तो बाहर की भी स्वतः कमजोर पड़ती है।
“एतदालम्बनं श्रेष्ठम्” — क्यों?
अहं का विसर्जन
↓
आत्मा की पहचान
↓
ब्रह्म आश्रय
अहं का अधिकांश ढाँचा विषयों से भरा है। उसका आधार विशाल है, शिखर सूक्ष्म। यदि आप कहते हैं—“मैं अपनी सुनूँगा”—तो आप प्रायः आधार की ही सुन रहे होते हैं।
ब्रह्म का आश्रय लेना किसी बाहरी सत्ता पर निर्भर होना नहीं है। यह अपनी सर्वोच्च संभावना पर टिकना है। जब अहं शून्य के समान हो जाता है, वही आत्मा है। और आत्मा ही ब्रह्म है।
इस आश्रय में व्यक्ति प्रतिष्ठित होता है — भीतर से स्थिर, निर्भीक, विनम्र।
बाहरी विद्रोह का समय था, वह आवश्यक था। पर आज सबसे बड़ा विद्रोह भीतर है। 80% शत्रु भीतर है।
जब भीतर का बंधन टूटता है, तो बाहर का भी ढह जाता है।
इसीलिए श्रुति कहती है — श्रेष्ठ आलम्बन चुनो। विषयों पर नहीं, अपने निचले स्वर पर नहीं, बल्कि उस सत्य पर जो तुम्हें मिटाए बिना नहीं मिलता।
और जहाँ अहं मिटता है, वहीं वास्तविक स्वतंत्रता आरंभ होती है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: क्या बाहरी परिवर्तन ही समाधान है?
विषय और विषयता का संबंध समझे बिना कोई निर्णय लेना जल्दबाज़ी है। बाहर का माहौल बदलना सहायक हो सकता है, पर पर्याप्त नहीं। यदि भीतर की संरचना वैसी ही रहे, तो परिवर्तन केवल सतही होगा।
एक ज़ेन कथा है। पहाड़ पर चढ़ता एक साधक दूसरे से पूछता है — “चोटी पर पहुँचकर कितना ज़ेन मिलेगा?” उत्तर मिलता है — “As much as you carry.”
अर्थ स्पष्ट है: जितना भीतर ले जाओगे, उतना ही पाओगे।
ढाबे की मक्खी को पाँच सितारा होटल में ले जाओ — वह फिर भी कचरा ढूँढेगी। स्थान बदल गया, प्रवृत्ति नहीं बदली। इसी प्रकार, यदि भीतर की व्यवस्था वही रहे, तो बाहरी परिवर्तन तुम्हें कटी पतंग की तरह भटका देगा — कहीं टिकाव नहीं होगा।
भीतर का परिवर्तन दो प्रकार से प्रकट हो सकता है। पहला, विषय ही बदल जाएँ। दूसरा, विषय का अर्थ और उससे संबंध बदल जाए। दूसरा अधिक गहरा है। विषय त्यागने से बड़ा है विषय का अर्थ त्यागना।
कई लोग पाँच सौ किलोमीटर दूर चले जाते हैं, पर जिस चीज़ से भागे थे, उसे भीतर और गहरा बैठा लेते हैं। भौतिक दूरी से मानसिक निकटता बढ़ जाती है। इसलिए घर छोड़ देना समाधान नहीं; संभव है आपने एक घर छोड़ा और दूसरा घर पकड़ लिया — एक पिता छोड़ा और दूसरा पिता ढूँढ लिया।
यह नहीं कहा जा रहा कि यदि आप गटर में हैं तो वहीं रहें। पर सबसे पहली और आवश्यक क्रांति भीतर की है। न्याय कर दो — जो वस्तु जिस स्तर की है, उसे उसी स्तर पर रख दो। जो जितने पानी का है, उसे उतने ही पानी में रखो। वस्तु की भौतिक सत्ता से अधिक उसका अर्थ महत्त्वपूर्ण है। अर्थ नहीं बदला तो उसकी भौतिकता तुम्हारे भीतर जीवित रहेगी।
शरीर भी एक विषय है। और अहंकार अपने ही शरीर का शोषण कर सकता है। इसलिए विषय-विमर्श केवल बाहरी वस्तुओं तक सीमित नहीं है; यह स्वयं की जैविक और मानसिक संरचना तक जाता है।
| बाहरी भागना | भीतरी बदलना |
|---|---|
| घर छोड़ना | घर के अर्थ का रूपांतरण |
| लोग बदलना | रिश्ते की दृष्टि बदलना |
| स्थान परिवर्तन | चेतना परिवर्तन |
प्रश्न 2: “सारे ग्रंथ फेंक दो।”?
यहीं से आधुनिक भ्रम शुरू होता है। कुछ विचारधाराएँ कहती हैं — “सारे ग्रंथ फेंक दो।” पर प्रश्न यह है कि जो यह कह रहा है, वह किस आधार पर खड़ा है? यदि वह स्वयं किसी परंपरा, किसी अध्ययन, किसी दीर्घ साधना से गुज़रा है, तो उसका कथन उसके लिए है; पर श्रोता यदि बिना तैयारी के उसे अपना ले, तो यह आधी-अधूरी समझ होगी।
यह लोकप्रिय कथन है — “सब एक ही बात करते हैं।” पर यह बौद्धिक आलस्य है। सब एक बात नहीं करते। भिन्न आचार्यों के ढाँचे, उनकी विधियाँ, उनके मूल आग्रह अलग-अलग होते हैं।
एक ओर कोई कहता है — ग्रंथों को त्याग दो। दूसरी ओर कोई कहता है — ग्रंथों से सीखो, पर उनके भीतर प्रवेश करो। एक कहता है — “मैंने किसी से नहीं सीखा।” दूसरा कहता है — “मैंने उपनिषदों और संतों से सीखा है।” यह अंतर मामूली नहीं, मूलभूत है।
दो नावों पर चलना कहीं नहीं पहुँचाता। यदि आप एक समुदाय में हैं, तो वह कोई वैचारिक बहस का अड्डा नहीं, एक विधि-आधारित शिक्षण-स्थल है। विश्वविद्यालय में रहकर यदि विश्वविद्यालय का पालन न करें, तो आप कहीं के नहीं रहेंगे।
“Window shopping” आध्यात्मिकता नहीं है। थोड़ी-थोड़ी बात सबकी सुनना ताकि किसी एक के प्रति प्रतिबद्ध न होना पड़े — यह निष्ठा से बचने की युक्ति है। निष्ठा में hedging नहीं होती। “Don’t put all your eggs in one basket” व्यापार की रणनीति हो सकती है; साधना की नहीं।
क्या यह बहस व्यक्तियों की है?
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या किसी विशेष नाम का नहीं है। यह उस मनोवृत्ति का है जो प्रतिबद्धता से बचने के लिए विविधता का बहाना बनाती है। यदि आप एक मार्ग में गहराई तक नहीं उतरे, पर दूसरे की ओर आकर्षित हो गए, तो यह खोज नहीं, अस्थिरता हो सकती है।
यदि कोई समुदाय ग्रंथों पर आधारित है, तो उसका मूल्य उसी में है। यदि आप वहाँ हैं, तो अपेक्षा होगी कि आप उन ग्रंथों में प्रवेश करें — न कि बाहरी वीडियो और नामों को लेकर भ्रम पैदा करें। यह कृतघ्नता भी ला सकता है — “जो मैं सुन रहा हूँ, वह तो मेरे भीतर पहले से था।” यदि सचमुच कहीं से सीखा है, तो स्वीकार करना ईमानदारी है।
प्रेम, ज्ञान और युद्ध
किसी का गला कट रहा हो और आप कहें — “चॉइसलेस अवेयरनेस ही सर्वोच्च है” — तो यह अधूरापन है। बिना प्रेम के ज्ञान शुष्क हो जाता है। युद्धभूमि में उतरने के लिए हृदय चाहिए। केवल विचार पर्याप्त नहीं।
यदि युद्ध में नहीं उतरना, तो कोई भी विचार बहाना बन सकता है। सच्चा मार्ग वहाँ है जहाँ प्रेम और ज्ञान का संगम हो — जहाँ हृदय धड़कता हो, और बुद्धि स्पष्ट हो।
प्रश्न 3: मुझे लगता है कि मैं नौकरी नहीं कर पाऊँगा। शिक्षक भी कहते हैं कि तुम escapist बन रहे हो?
अर्जुन ने युद्ध से पहले प्रश्न किया “मैं कैसे लड़ूँ मेरे गुरु तो वहाँ खड़े है”।
यदि आप एक गुरु से प्रश्न करते हुए भीतर ही भीतर किसी और को गुरु मान बैठे हैं, तो यह ईमानदार स्थिति नहीं है। गुरु कोई कॉलेज-टीचर की पदवी नहीं; वह वह है जिसके सामने आप अपनी धारणा काटने आते हैं।
आप यहाँ अपनी बात कहने नहीं, अपनी बात की परीक्षा करने आए हैं। यदि परीक्षा का साहस नहीं, तो निष्ठा का दावा व्यर्थ है।
यदि कोई बाहरी authority नहीं, तो अपना अहंकार ही authority बन जाएगा। विद्रोह केवल विद्रोह के लिए नहीं हो सकता। किसी चीज़ को हटाने के लिए होना चाहिए — भीतर की जड़ता को।
जीवन के छोटे-छोटे कार्यों में हम विशेषज्ञ बुलाते हैं। नल ठीक कराना हो तो प्लंबर। पर जीवन का प्रश्न हो तो किसी भी रिश्तेदार, किसी भी स्क्रीन से पूछ लेते हैं। उच्चतम प्रश्न उच्चतम स्रोतों से पूछे जाने चाहिए।
आपको शर्म आनी चाहिए। आप गीता कम्यूनिटी पर हैं और लेकिन आप गीता, ऋषि अष्टावक्र, उपनिषद पूछने की जगह आप अपने फूफा, मौसी, ताऊ से कैसे पूछने चले जाते हो? उच्चतम से पूछो, लाओ त्ज़ु से पूछो, अष्टावक्र, कृष्ण, कबीर, बुल्लेशाह से पूछो।
अंतिम एकीकरण
अंततः पूरा प्रश्न आश्रय का है। आप किस पर टिके हैं? विषयों पर? विचारों पर? व्यक्तियों पर? या सत्य पर?
यदि आप हर जगह सिर झुकाते हैं ताकि कहीं पूर्ण रूप से न झुकाना पड़े, तो भीतर ईमानदारी नहीं है। और यदि आप कहीं से सीखकर भी उसे स्वीकार नहीं करते, तो कृतज्ञता का अभाव धीरे-धीरे विष बन जाता है।
मार्ग चुनना कठिन है। पर उससे भी कठिन है — चुने हुए मार्ग पर ठहरना।
स्वतंत्रता शिथिलता नहीं है। स्वतंत्रता तपस्या है।
विषयों का शासन आसान है; आत्मानुशासन कठिन।
पलायन सरल है; निष्ठा कठोर।
इसलिए प्रश्न बाहर से कम, भीतर से अधिक पूछो।
क्या तुम भाग रहे हो — या बढ़ रहे हो?
यही अंतर समूची साधना का निर्णायक बिंदु है।