कामना
कामना माने— [[अहंकार]] की वासना ।
कामना का जन्म इस विश्वास से होता है कि “मैं अभी पर्याप्त नहीं हूँ।”
फिर मन कहता है:
- कुछ और मिल जाए
- कोई और मिल जाए
- मैं कुछ और बन जाऊँ
यही [[कामना]] है।
कामना वस्तु की नहीं होती—स्वयं की अपूर्णता की कल्पना की होती है।
सही intent से उठी सूक्ष्म इच्छा अलग है।
जब इच्छा सत्य के विपरीत नहीं जाती, तब वही [[प्रार्थना]] बन सकती है।
इसलिए हर इच्छा दोष नहीं है।
प्रश्न यह है:
यह इच्छा किससे उठ रही है—अहंकार से या सत्य से?