AVALOKAN श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 11 — प्रेम = धर्म के अविरुद्ध काम

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 11 — प्रेम = धर्म के अविरुद्ध काम

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।11।।

अनुवाद:
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों में काम और राग से रहित बल हूँ, और प्राणियों में धर्म के अविरुद्ध काम हूँ।

काव्य:
कम अहम होता गया
दुर्बल मैं खोता गया
गति प्रकृति में सहज
प्रेम धर्म होता गया

बल, काम और धर्म का वास्तविक अर्थ

अहं → कामना → राग → दुर्बलता

अहं का क्षय → अबिरोध → बल → प्रेम → धर्म

हर श्लोक का मर्म नया नहीं होता, पर उसका स्पर्श नया होता है। ज्ञान एक ही रहता है, पर उसका प्रकट होना हर बार ताज़ा अनुभव जैसा होता है। जैसे कोई प्रिय व्यक्ति बार-बार आए—बातें पुरानी हों, पर मिलन नया लगे। यही सनातन का अर्थ है।

जो पुराना होकर भी नया रहे, वही सनातन है।

इसलिए शास्त्र पुनरावृत्ति नहीं करते; वे एक ही सत्य को अलग-अलग कोणों से प्रकाशित करते हैं। एक ही श्लोक के अनेक अर्थ निकल सकते हैं—और तब भी अर्थ शेष रहते हैं। पूर्णता ऐसी ही है। [[Ishavasya Upanishad — Fullness as the Absence of Division|Ishavasya Upanishad]] के शांति-पाठ को इस प्रकार भी पढ़ा जा सकता है: पूर्ण को पा लेने पर भी पूर्ण पाना शेष रहता है।

यदि पिछले श्लोक में बुद्धि और तेज की बात थी, तो यहाँ [[बल]] और काम की। यह बौद्धिक खेल नहीं है। यह दिल का खेल है।

प्रश्न यह नहीं है कि तुममें बल क्यों नहीं है।
प्रश्न यह है कि तुम्हारी शक्ति कहाँ चली गई।


दुर्बलता का कारण: बल की कमी नहीं, अहं की अधिकता

ऊर्जा → कामना → कल्पना → राग → थकान → दुर्बलता

“मैं बलवानों में काम और राग से रहित बल हूँ”

मनुष्य सामान्यतः अपनी दुर्बलता को गुणों की भाषा में समझता है। वह कहता है—मुझमें तमस अधिक है, मुझमें तेज नहीं, मुझमें साहस नहीं, मुझमें शौर्य नहीं।

परंतु यह देखने की आवश्यकता है कि कहीं यह भाषा स्वयं [[अहंकार|अहं]] की रक्षा का साधन तो नहीं।

तुम दुर्बल नहीं हो।
तुम अहंकारी हो।

जब मन काम और राग से भरा होता है, तब सारी ऊर्जा बाहर की वस्तुओं में बँध जाती है। इच्छा, कल्पना, तुलना, अपेक्षा—ये सब मिलकर चेतना को चूस लेते हैं। व्यक्ति बहुत कुछ करना चाहता है, पर कर नहीं पाता। उसकी शक्ति कर्म में नहीं, कल्पना में खर्च हो जाती है।

इसीलिए कहा जा सकता है:

[[कामना]] → कल्पना → ऊर्जा का क्षय → दुर्बलता

[[बल]] का अभाव नहीं है।
बल की चोरी हुई है।

और चोर कौन है?
[[अहंकार|अहं]]।

अहंकार तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु है। वह तुम्हें बाहर से नहीं, भीतर से खाली करता है। वही [[प्रेम]] को खा जाता है, वही साहस को सुखा देता है, वही स्पष्टता को धुँधला कर देता है।

इसलिए जो व्यक्ति दूसरों के प्रति प्रेमहीन है, वह वास्तव में प्रेम से वंचित नहीं—अहंकार से भरा हुआ है।

“जब काम भरा हो आँख में तो बल नज़र नहीं आता।”

जहाँ दृष्टि कामना से भरी हो, वहाँ बल दिखाई नहीं देता। क्योंकि बल का संबंध प्राप्ति से नहीं, स्वतंत्रता से है।


राग की पकड़: निम्न आसक्ति और शक्ति का ह्रास

निम्न सुख → आसक्ति → राग → बन्धन → बलहीनता

मनुष्य प्रायः किसी बहुत बड़े संकट में नहीं हारता। वह अपने सामान्य जीवन में हारता है—अपने साधारण आकर्षणों, छोटी आदतों, सूक्ष्म आसक्तियों में।

वह वहाँ घायल होता है जहाँ उसे चोट दिखती भी नहीं।

एक मक्खी गुड़ पर बैठती है। उसे मिठास मिलती है। वह आनंद लेती है। पर जितना अधिक वह रुकती है, उतना ही उसके पैर धँसते जाते हैं। अंततः वही सुख उसका बन्धन बन जाता है।

मनुष्य की स्थिति भी ऐसी ही है।

तुम बलहीन इसलिए नहीं हो कि तुम्हारे सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं।
तुम बलहीन इसलिए हो क्योंकि तुम किसी छोटी, निम्न, परिचित वस्तु को पकड़े बैठे हो।

राग का यही स्वभाव है। वह आकर्षण के रूप में आता है, बन्धन के रूप में समाप्त होता है।

और यही कारण है कि शास्त्र काम और राग से रहित बल की बात करते हैं। यहाँ बल का अर्थ केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि आंतरिक स्वायत्तता है।

जो पकड़ा हुआ है, वही गिराता है।


लोकधर्म और सत्य: हार कहाँ होती है

शास्त्र → स्पष्टता

लोकधर्म → आदत → समझौता → अहं की रक्षा

मनुष्य गीता सुनकर प्रेरित हो सकता है, पर जीवन में हारता कहाँ है?
जब वह तथाकथित “लोकधरमी” लोगों के बीच लौटता है।

वहीं उसकी परीक्षा होती है।

जब सत्य की बात समाप्त होती है और सामाजिक व्यवहार आरम्भ होता है—वहीं व्यक्ति फिसलता है। तुलना, मान्यता, डर, प्रतिष्ठा—ये सब फिर सक्रिय हो जाते हैं।

यही सामान्य पराजय है।

तुम्हारी हार युद्धभूमि में नहीं होती।
तुम्हारी हार साधारण बातचीत में होती है।

जब गीता के बाद तुम लोकधर्मी लोगों से बात करते हो, वहीं देखो—किसकी गुणवत्ता अधिक है? सत्य की, या सुविधा की?

सुनना पर्याप्त नहीं है।
जितना सुन लो, परिवर्तन नहीं आएगा जब तक [[अहंकार|अहं]] को चोट नहीं पहुँचती।

ज्ञान सूचना नहीं है।
ज्ञान संरचना तोड़ता है।

यदि वह अहंकार को सुरक्षित रखे, तो वह ज्ञान नहीं, सजावटी विचार है।


धर्मानुकूल काम: धर्म के साथ नहीं, धर्म के विरोध में मत जाओ

प्रकृति → धर्म

अहं → विरोध

अबिरोध → सहजता → धर्मानुकूल काम

“धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि”

यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म और निर्णायक बात कही गई है।

कृष्ण यह नहीं कह रहे कि “धर्म के साथ चलो।”
वे कह रहे हैं—धर्म के विरुद्ध मत जाओ।

अंतर बहुत गहरा है।

यदि कहा जाए “धर्म के साथ चलो”, तो मन तुरंत एक परियोजना बना लेता है—अब मुझे धार्मिक बनना है, अब मुझे कुछ प्राप्त करना है।

पर यहाँ बात उलटी है।

धर्म पहले से है।
प्रकृति पहले से धर्ममय है।

तुम्हें धर्म बनाना नहीं है; तुम्हें केवल उसका विरोध बंद करना है।

इसीलिए कहा गया—धर्म के अविरुद्ध काम।

अर्थात् वह इच्छा, वह गति, वह आकांक्षा जो सत्य के विपरीत नहीं जाती। जो प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं करती।

प्रकृति माँ है।
उसके विरुद्ध जाकर तुम कभी शांत नहीं हो सकते।

धर्म का अर्थ यहाँ नियम नहीं, अस्तित्व की अंतर्निहित व्यवस्था है।

इसलिए धर्मानुकूल काम का अर्थ है—अबिरोध।

न संघर्ष, न कृत्रिम नियंत्रण।
सिर्फ असत्य का विरोध छोड़ देना।


प्रार्थना का वास्तविक अर्थ: “तू रहे, मैं न रहूँ”

अहं → नियंत्रण → संघर्ष

समर्पण → अबिरोध → प्रार्थना

[[प्रार्थना]] सामान्यतः माँग बन जाती है।
मनुष्य ईश्वर से भी अपने अहंकार की सेवा चाहता है।

पर वास्तविक प्रार्थना का स्वरूप भिन्न है।

“मालिक, तू रहे—मैं न रहूँ।”

यही प्रार्थना है।

यह आत्म-नाश की भाषा नहीं, अहंकार-विलोप की भाषा है। यहाँ “मैं” से आशय व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह झूठा केंद्र है जो हर चीज़ को अपनी शर्तों पर चाहता है।

एकमात्र प्रार्थना जो [[अहंकार|अहं]] कर सकता है, वह यही है कि उसकी आँखें सत्य से न हटें।

संकल्प यही होना चाहिए:
जब सत्य सामने आए, तब दृष्टि मुड़ न जाए।
सब कुछ चला जाए, पर एक स्थान ऐसा हो जहाँ अबिरोध बना रहे।

विरोध हमेशा [[अहंकार|अहं]] करता है।
जहाँ अहंकार हटता है, वहाँ धर्म, बल और प्रेम स्वयं उपस्थित हो जाते हैं।


सूक्ष्म कामना: कामना और प्रार्थना का भेद

स्थूल अहं → स्वार्थपूर्ण कामना

सूक्ष्म अहं → सत्याभिमुख इच्छा → प्रार्थना

यहाँ एक और सूक्ष्म भेद आवश्यक है।

सभी कामनाएँ एक जैसी नहीं होतीं।

लोकधर्मी दृष्टि प्रायः हर इच्छा को दोष मान लेती है। फिर व्यक्ति कामना के पीछे डंडा लेकर दौड़ता है, मानो इच्छा स्वयं शत्रु हो।

परंतु सही इरादे से भी कामना उठती है।

यदि इच्छा अत्यंत सूक्ष्म [[अहंकार|अहं]] से आती है—जहाँ स्वार्थ न्यूनतम है, जहाँ सत्य की ओर झुकाव है—तो वही कामना प्रार्थना बन जाती है।

कृष्ण कहते हैं—मैं धर्म के अविरुद्ध काम हूँ।

अर्थात् जो इच्छा सत्य के विपरीत नहीं जाती, जो जीवन को विकृत नहीं करती, जो भीतर से निर्मल है—वह बाधा नहीं है।

वही कला को जन्म देती है।
वही कविता को।
वही दर्शन को।
वही प्रामाणिक प्रेम को।


हारना जहाँ आवश्यक है

जहाँ समर्पण चाहिए → हार

जहाँ सत्य चाहिए → दृढ़ता

सही पराजय → वास्तविक शक्ति

जीवन में हर जगह लड़ना शक्ति नहीं है।
कई स्थान ऐसे हैं जहाँ हारना आवश्यक है।

जहाँ तुम्हारा [[अहंकार|अहं]] बच रहा है, वहाँ हार जाओ।
तभी वास्तविक ताकत खुलेगी।

क्योंकि जो हर जगह जीतना चाहता है, वह सत्य के सामने भी लड़ता है।

और जो सत्य के सामने हारना सीख जाता है, वही संसार में उचित प्रतिरोध कर सकता है।

जिस चीज़ का विरोध करना चाहिए, उसका विरोध तभी संभव है जब अनावश्यक विरोध समाप्त हो।

यदि एक सत्य को पूर्ण निष्ठा से पकड़ लो, तो वही शक्ति बन जाता है। गांधी का उदाहरण इसी अर्थ में समझा जा सकता है। वे सर्वज्ञ ऋषि नहीं थे; पर जो थोड़ा सत्य उन्होंने पकड़ा, उसे छोड़ा नहीं। वही जिद शक्ति बनी।


सौ बाप और एक सत्य

इन्द्रिय → समाज → लोकधर्म → भय → अनेक स्वामी

सत्य → एक केंद्र → स्वतंत्रता

मनुष्य का संकट यह है कि उसने अनेक स्वामियों को स्वीकार कर लिया है।

वह शरीर की आज्ञा मानता है।
समाज की आज्ञा मानता है।
प्रतिष्ठा की आज्ञा मानता है।
लोकधर्म की आज्ञा मानता है।
भय की आज्ञा मानता है।

जब इतने “बाप” हों, तब सत्य को पिता कैसे मानोगे?

तुम दुनिया का विरोध नहीं कर रहे—अक्सर तुम सत्य का विरोध कर रहे होते हो।

तुम्हारे अधिकांश संस्कार प्रेम से नहीं, भय से बने हैं।

और भय से बना जीवन कभी धर्ममय नहीं हो सकता।


प्रेम: सत्य के प्रति ईमानदारी

प्रेम = सत्य के प्रति ईमानदारी
प्रेम = सत्य के लिए बेखुदी

[[प्रेम]] को सामान्यतः भावना समझा जाता है, पर यहाँ उसका अर्थ भिन्न है।

प्रेम = सत्य के प्रति ईमानदारी।

और उससे भी गहराई में:

प्रेम = सत्य के लिए बेखुदी।

जहाँ स्वयं की रक्षा प्राथमिक है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता।
जहाँ सत्य स्वयं से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, वहीं प्रेम प्रारम्भ होता है।

एक प्रेम सड़ा-गला भी हो सकता है—आसक्ति, स्वामित्व, भय और निर्भरता से भरा हुआ। दूसरा सहज, निर्मल, कृष्ण-प्रेम हो सकता है—जहाँ केंद्र स्वयं नहीं, सत्य है।

बाहर से कर्म एक जैसा दिख सकता है।
भीतर से दोनों में आकाश-पाताल का अंतर है।

यही धर्मानुकूल काम है।
यही बल है।
यही प्रार्थना है।


अंतिम एकीकरण: बल, धर्म और प्रेम का अभेद

अहं घटा
   │
   ▼
राग घटा
   │
   ▼
बल प्रकट
   │
   ▼
अबिरोध
   │
   ▼
प्रेम = धर्म

अब श्लोक के दोनों भाग एक हो जाते हैं।

“[[कामना|काम]] और राग से रहित बल” और “[[सनातन धर्म|धर्म]] के अविरुद्ध काम”—ये दो अलग शिक्षाएँ नहीं हैं। ये एक ही संरचना के दो पक्ष हैं।

जहाँ [[अहंकार|अहं]] घटता है, वहाँ राग घटता है।
जहाँ राग घटता है, वहाँ ऊर्जा मुक्त होती है।
जहाँ ऊर्जा मुक्त होती है, वहाँ बल प्रकट होता है।
जहाँ बल प्रकट होता है, वहाँ जीवन प्रकृति के विरोध में नहीं चलता।
और वही अबिरोध [[प्रेम]] है।

इसलिए:

कम अहं → कम दुर्बलता → अधिक बल → अधिक प्रेम → धर्म

यह कोई नैतिक कार्यक्रम नहीं है।
यह अस्तित्व की संरचना है।

अंततः प्रश्न यह नहीं कि तुम्हें कितना बल चाहिए।

प्रश्न यह है—
तुम्हारी शक्ति को खा कौन रहा है?

उत्तर वही है, जो बार-बार लौटता है:
[[अहंकार|अहं]]।

और जहाँ वह हटता है, वहीं धर्म सहज हो जाता है।