क से ख तक — व्यावहारिक वेदांत भाग 1
अगला कदम ही अंतिम पड़ाव है
आप जहाँ खड़े हैं, वहाँ से जो ठीक अगला कदम है — वही आपका पड़ाव है, वही आपके लिए अंतिम है। हम अक्सर कहते हैं, “मुझे मंज़िल तक पहुँचना है”, मानो मंज़िल पर पहुँचने के बाद भी हम वही रहेंगे जो अभी हैं। पर सच यह है कि हम किसी दूर की मंज़िल तक नहीं पहुँचते; हम सिर्फ अगले कदम तक पहुँचते हैं — और उस कदम के साथ हमारा पुराना स्वरूप मिट जाता है। हर कदम पर यात्री बदलता है; जो आगे बढ़ता है, वह पहले जैसा नहीं रहता।
कदम-कदम पर पुनर्जन्म
मान लो “क” को “ज्ञ” बनना है। “क” चाहे जितनी जल्दी “ज्ञ” बनना चाहे, उसे पहले “ख” बनना ही पड़ेगा। और जैसे ही “ख” बनता है, पुराना “क” समाप्त हो जाता है। इसे ही क्षण-क्षण का पुनर्जन्म कह सकते हैं — हर कदम पर नया जन्म, हर परिवर्तन में पुराना समाप्त।
क → ख → ग → ... → ज्ञ
(हर कदम पर नया स्वरूप, पुराना समाप्त)
“क” के लिए “ख” बनना ही सबसे सही और वास्तविक मंज़िल है। लेकिन मन अक्सर महासमाधि, निर्विकल्पता या परम योग जैसी दूर की कल्पनाओं में खो जाता है — जिनका वर्तमान कदम से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
दूर की मंज़िल का मोह और वर्तमान की उपेक्षा
हमें “ज्ञ” की इतनी चाह होती है कि “ख” को तुच्छ समझ लेते हैं। हम भविष्य की ऊँची बातों में इतने उलझ जाते हैं कि वर्तमान का सच्चा अवसर खो देते हैं। आम आदमी की चूक यही है — वह यह नहीं देखता कि आज उसके आसपास कहाँ बंधन हैं और कहाँ अवसर।
क ──► ख ──► ग ──► ... ──► ज्ञ
│ │
│ └─ वर्तमान का सही कदम = वास्तविक मंज़िल
└─ दूर की मंज़िल की कल्पना, पर पहला कदम छोड़ा
यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति बैठा-बैठा पकौड़े खा रहा हो और बहस कर रहा हो — “चलना 8 मील है या 10 मील?”। हमारी आध्यात्मिक साधना भी अक्सर ऐसी ही बन जाती है: बात बड़ी-बड़ी, पर कदम शून्य।
हार कहाँ होती है?
आप वहाँ हार रहे हैं जहाँ जीत आसान थी — जहाँ थोड़ा सा चलना ही पर्याप्त था। आपको कोई उच्चतम सत्य नहीं हरा रहा; आपको आपकी धारणाएँ हरा रही हैं। आप उतना ही कर सकते हैं जितना आप अभी हैं। “क” को बस “ख” तक पहुँचना है — वही उसके लिए सच्चा विकास है।
जीवन का शिखर, आनंद और असीमता — इनकी कल्पना में फँसने की बजाय यह देखना ज़रूरी है कि अभी मेरे लिए सही छोटा कदम क्या है। क्या मैं उन छोटी-छोटी बातों को सुधार रहा हूँ जिन्हें सुधारना चाहिए? या बड़े लक्ष्य का बहाना बनाकर छोटे कदम से भी बच रहा हूँ?
सीमाओं के साथ जीना ही जीव होना है
जीव होना मतलब सीमाओं के साथ जन्म लेना। अस्तित्व आपसे यह नहीं कहता कि अपनी कमियों के बावजूद एक ही कदम में सागर पार कर जाओ। वह कहता है — सीमाओं, दोषों और विकारों के साथ भी जो थोड़ा सा संभव है, उसे ईमानदारी से करो।
जीवन आपको इसलिए दंड नहीं देता कि आप परम-समाधि तक नहीं पहुँचे; वह इसलिए चोट देता है क्योंकि आपने वह भी नहीं किया जो आसान, सहज और सामने था। जो असीम और कठिन है, उसमें असफल होने पर जीवन कठोर नहीं होता; पर जो सरल और सुलभ था, उसमें चूकना जीवन को अस्वीकार्य लगता है।
छोटा अभ्यास ही बड़ा परिवर्तन लाता है
आप इसलिए नहीं चूकते कि आपको विशाल साहित्य याद नहीं; आप इसलिए चूकते हैं कि एक दिन में एक दोहा भी याद नहीं करते। साधना का अर्थ भारी लक्ष्य नहीं, बल्कि छोटे, निरंतर कदम हैं।
| यह मत करो | यह करो |
|---|---|
| पूरा कबीर बीजक पढ़ने की ज़िद | रोज़ एक दोहा स्मरण |
| पूरी गीता एक साथ पढ़ना | प्रतिदिन एक श्लोक स्मरण |
| अत्यंत कठिन साहित्य से शुरुआत | सरल और सहज साहित्य से शुरुआत |
| “ज्ञ” की कल्पना में खोना | “ख” बनने का छोटा कदम उठाना |
हीनता, बड़ा लक्ष्य और माया
हम अपनी हीनता से इतने डरते हैं कि लगातार कुछ “बड़ा” चाहते रहते हैं। लेकिन हीनता का भाव ही झूठा है, इसलिए उससे जन्मा बड़ा लक्ष्य भी अक्सर झूठा हो जाता है। जो भीतर से बड़ा होता है, उसे छोटे के साथ खेलने में कोई समस्या नहीं होती। पर जिसे अपने छोटा होने का डर होता है, वह हर चीज़ में बड़ा-बड़ा चाहता है — ताकि अपनी हीनता छिपा सके।
जब भी वह थोड़ा बड़ा पाता है, उसका छोटापन और बढ़ जाता है, क्योंकि भीतर का भय बना रहता है। यही माया है — जब छोटा, बड़े को पाने की दौड़ में लगा हो; और मुक्ति तब है जब बड़ा, छोटे के साथ सहज खेल सके।
| माया | मुक्ति |
|---|---|
| भीतर हीनता | भीतर अनंतता |
| बड़े लक्ष्य से छोटापन छिपाना | छोटे के साथ सहज क्रीड़ा |
| दिखावे का आध्यात्म | प्रेम और सरलता |
सीधे परम तक पहुँचने की अधीरता
हम सीधे परमात्मा को पाना चाहते हैं — जैसे राम को पाने से पहले हनुमान या लक्ष्मण को जानना आवश्यक नहीं। पर प्रश्न यह है: हम अभी जी कैसे रहे हैं? यदि हमने अभी का जीवन समझा ही नहीं, तो ऊँची समाधि कैसे मिलेगी?
पहले देखो — तुम कहाँ खड़े हो, क्या कर रहे हो, मन में कैसी प्रवृत्तियाँ उठती हैं। यदि तुम अभी ऐसे ही हो, तो थोड़ा सा भी सही कदम मिल जाए, क्या उसके लिए कृतज्ञ नहीं होना चाहिए? या फिर यह शिकायत करनी चाहिए कि “मेरी पात्रता तो इससे बड़ी थी”?
सार
सच्ची साधना दूर की मंज़िलों के सपनों में नहीं, बल्कि अभी के छोटे और सच्चे कदम में है। हर कदम पर पुराना स्वरूप मिटता है और नया जन्म होता है। जो सरल और सामने है, उसे ईमानदारी से करना ही आध्यात्मिकता की जड़ है। जब हम छोटे को स्वीकारते हैं, तभी बड़ा सहज रूप से प्रकट होता है।