माने क्या?

चेतना माने क्या

चेतना माने क्या?

“चेतना वह है जिसके कारण सब कुछ जाना जाता है,
पर जिसे किसी वस्तु की तरह जाना नहीं जा सकता।”

व्याख्या:
चेतना कोई विचार नहीं है।
चेतना कोई भावना नहीं है।
चेतना कोई अनुभव भी नहीं है।

चेतना वह है — जिसमें विचार, भावना और अनुभव प्रकट होते हैं।

  • शरीर बदलता है।
  • मन बदलता है।
  • भावनाएँ बदलती हैं।

लेकिन जो इन सबको जान रहा है — वह स्वयं नहीं बदलता।
वही चेतना है।

चेतना वस्तु नहीं है;
वह जानने की क्षमता भी नहीं —
वह स्वयं जानना है।


चेतना की प्रकृति

“चेतना = साक्षी + प्रकाश”

व्याख्या:

  1. साक्षी – जो देखता है, पर जुड़ता नहीं।
  2. प्रकाश – जिसके बिना कुछ भी प्रकट नहीं हो सकता।

जैसे सूर्य के प्रकाश से वस्तुएँ दिखती हैं,
वैसे ही चेतना के कारण विचार और जगत प्रकट होते हैं।

चेतना किसी प्रयास से उत्पन्न नहीं होती।
वह पहले से ही है —
विचार आने से पहले भी,
विचार जाने के बाद भी।


आध्यात्मिक अर्थ

चेतना = “मैं हूँ” का शुद्ध बोध

जब “मैं” से सारी पहचानें हट जाती हैं —
“मैं शरीर हूँ”, “मैं मन हूँ”, “मैं भूमिका हूँ” —
तब जो शेष रहता है, वही चेतना है।

चेतना में न अतीत है, न भविष्य।
न तुलना है, न भय।

वहीं [[समत्व]] है।
वहीं अद्वैत है।
वहीं वास्तविक शांति है।

चेतना को पाना नहीं है —
केवल पहचानना है।


सार

चेतना अनुभव की वस्तु नहीं,
अनुभव का आधार है।

वह आती-जाती नहीं —
सदैव उपस्थित है।

जब मन शांत होता है,
तो कुछ नया प्रकट नहीं होता —
केवल चेतना स्वयं में प्रकट हो जाती है।