चेतना

[[चेतना माने क्या]]?

“चेतना वह है जिसके कारण सब कुछ जाना जाता है,
पर जिसे किसी वस्तु की तरह जाना नहीं जा सकता।”

व्याख्या:
चेतना कोई विचार नहीं है।
चेतना कोई भावना नहीं है।
चेतना कोई अनुभव भी नहीं है।

चेतना वह है — जिसमें विचार, भावना और अनुभव प्रकट होते हैं।

  • शरीर बदलता है।
  • मन बदलता है।
  • भावनाएँ बदलती हैं।

लेकिन जो इन सबको जान रहा है — वह स्वयं नहीं बदलता।
वही चेतना है।

चेतना वस्तु नहीं है;
वह जानने की क्षमता भी नहीं —
वह स्वयं जानना है।