BHAJAN प्रेम

जिस तन लगिआ इश्क कमाल

जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल, नाचे बेसुर ते बेताल।

दरदमन्द नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े।
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े, बूझे अपणा आप खिआल।

जिसने वेश इश्क़ दा कीता, धुर दरबारों फतवा लीता।
जदों हजूरों प्याला पीता, कुछ न रह्या सवाल-जवाब।

जिसदे अन्दर वस्स्या यार, उठिया यार ओ यार पुकार।
ना ओह चाहे राग न तार, ऐवें बैठा खेडे हाल।

बुल्हिआ शाह नगर सच पाया, झूठा रौला सब्ब मुकाया।
सच्चियां कारण सच्च सुणाया, पाया उसदा पाक जमाल।

~ बाबा बुल्लेशाह

                      अहं
                       │
                  प्राप्ति की भूख
                       │
              प्रकृति के साथ तादात्म्य
                       │
               भय • मोह • कामना
                       │
                असंतोष • संघर्ष
                       │
                      इश्क़
                       │
              मुक्ति की ओर आकर्षण
                       │
               आत्मा की ओर गमन
                       │
             अभिव्यक्ति • नृत्य • समर्पण
                       │
                  निष्कामता

इश्क़ का अर्थ : मोह नहीं, मुक्ति

मोह → पकड़ना
इश्क़ → मुक्त होना

प्रकृति → बन्धन
आत्मा → स्वतंत्रता

बाबा बुल्लेशाह का “इश्क़” भावनात्मक उत्तेजना, संबंधों की रोमांटिकता, या सामाजिक प्रेम का गीत नहीं है। यहाँ इश्क़ का अर्थ अस्तित्वगत है। यह मनुष्य के भीतर उपस्थित उस गहरी आकांक्षा का नाम है जो स्वयं अपनी सीमाओं से मुक्त होना चाहती है। इसलिए जब वे कहते हैं — “जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल” — तो उसका आशय किसी भावुक प्रेम से नहीं, बल्कि उस आंतरिक विस्फोट से है जहाँ मनुष्य पहली बार देखता है कि उसका पूरा जीवन उधार की संरचनाओं पर आधारित था।

“जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल, नाचे बेसुर ते बेताल।”

सुर, ताल, राग, लय — ये सभी सामाजिक संरचनाएँ हैं। मनुष्य ने सामूहिक सुविधा के लिए व्यवहार, नैतिकता, सफलता, प्रतिष्ठा और स्वीकृति के ढाँचे बनाए। सामान्य व्यक्ति इन्हीं ढाँचों के भीतर जीता है। उसका हर कर्म किसी न किसी सामाजिक ताल में बँधा होता है। वह इस डर से संचालित होता है कि यदि उसने स्वीकृत लय छोड़ी तो अस्वीकार कर दिया जाएगा।

लेकिन इश्क़ उसी क्षण आरम्भ होता है जब चेतना यह देखती है कि सत्य किसी सामाजिक ताल का मोहताज नहीं है। सत्य पूर्वनिर्धारित नहीं चलता। वह जीवित है। इसलिए प्रेमी का जीवन धीरे-धीरे योजनाबद्ध संरचना से मुक्त होकर एक जीवित नृत्य बन जाता है।

यह अव्यवस्था नहीं है।
यह स्वाभाविकता है।

मनुष्य के भीतर मूलतः केवल तीन तत्त्व हैं:

  1. [[अहंकार|अहं]]
  2. प्रकृति
  3. [[आत्मा]]

अहं स्वयं में स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वह पहचानों का संकलन है। शरीर, स्मृति, भूमिका, उपलब्धियाँ, इच्छाएँ — इन सबका संयुक्त भ्रम ही अहं है। यह या तो प्रकृति के साथ जुड़ सकता है या आत्मा के साथ। यही जीवन का वास्तविक चुनाव है।

प्रकृति का अर्थ यहाँ केवल बाहरी संसार नहीं है, बल्कि समस्त परिवर्तनशीलता है — सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, कामना-भय, प्राप्ति-अप्राप्ति। आत्मा का अर्थ उस अचल सत्ता से है जो परिवर्तन को देखती है लेकिन स्वयं परिवर्तन नहीं बनती।

इश्क़ वही आंतरिक आकर्षण है जिसमें अहं पहली बार आत्मा की ओर मुड़ता है। इसलिए कहा जा सकता है:

अहं का आत्मा की ओर आकर्षण ही इश्क़ है।

इसी कारण बुल्लेशाह का प्रेम संसार में उलझने का नाम नहीं है। संसार में उलझना मोह है। प्रेम मुक्ति की घोषणा है। जब चेतना यह कहती है — “मेरे लिए मुक्ति से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं” — तभी प्रेम जन्म लेता है।

सही नाम देना : मुक्ति की शुरुआत

गलत नाम → भ्रम
भ्रम → तादात्म्य
तादात्म्य → बन्धन

सही नाम → स्पष्टता
स्पष्टता → दूरी
दूरी → मुक्ति

मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या केवल अज्ञान नहीं है। समस्या यह है कि वह वस्तुओं को उनके वास्तविक नाम से पुकारता ही नहीं। और जहाँ नाम गलत हो जाता है, वहाँ दृष्टि भी विकृत हो जाती है।

वासना को प्रेम कहा जाता है।
भय को महत्वाकांक्षा कहा जाता है।
आसक्ति को समर्पण कहा जाता है।
असुरक्षा को सफलता की भूख कहा जाता है।

यही कारण है कि मनुष्य भ्रम से बाहर नहीं निकल पाता।

यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से अपने भीतर उपस्थित भय को भय कहना शुरू कर दे, तो भय की संरचना टूटने लगती है। क्योंकि भय अंधकार में जीवित रहता है। उसका अस्तित्व गलत व्याख्या पर टिका होता है। इसी प्रकार मोह तभी तक बचा रहता है जब तक उसे प्रेम कहा जाता है।

सही नाम देना आत्मबोध की शुरुआत है।

मनुष्य तथ्यों को भी सत्य समझ लेता है। उदाहरण के लिए — “मेरे हाथ में पाँच उंगलियाँ हैं” — यह तथ्य है, सत्य नहीं। तथ्य परिवर्तनशील जगत से संबंधित हैं। सत्य उस चेतना से संबंधित है जो सभी तथ्यों को जानती है।

इसीलिए कहा गया:

“झूठ का सच के प्रति खिंचाव ही इश्क़ है।”

यह वाक्य अत्यंत सूक्ष्म है। अहं स्वयं में वास्तविक सत्ता नहीं है। वह एक मनोवैज्ञानिक निर्माण है। वह लगातार “होने” की कोशिश करता है — उपलब्धियों से, संबंधों से, पहचान से, स्मृति से। लेकिन जितनी कोशिश होती है, उतना ही भीतर खालीपन बना रहता है।

अहं का पूरा संघर्ष यही है:

अपूर्णता → उपलब्धि की खोज → क्षणिक संतोष → पुनः खालीपन

इश्क़ तब जन्म लेता है जब यह देखा जाता है कि समस्या उपलब्धियों की कमी नहीं, बल्कि “मैं” की संरचना ही है। तब भीतर से पुकार उठती है — “जो मैं नहीं हूँ, उससे मुक्त कर दो।”

इस अर्थ में हर मनुष्य प्रेमी है। क्योंकि हर मनुष्य स्वयं से थका हुआ है। अंतर केवल इतना है कि कोई झूठा प्रेमी है और कोई सच्चा। झूठा प्रेमी प्रकृति की ओर जाता है, जबकि सच्चा प्रेमी आत्मा की ओर।

दोनों पुकारते हैं:

  • प्रकृति भी
  • आत्मा भी

चुनाव मनुष्य को करना है। कोई और उसके स्थान पर यह निर्णय नहीं करेगा।

संसार और प्रेमी का संघर्ष

समाज → सूत्र → नियंत्रण
प्रेम → स्वाभाविकता → अनियोजित जीवन

“दरदमन्द नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े।”

प्रेमी संसार से इसलिए दूर नहीं जाता कि उसे मनुष्यों से घृणा हो गयी है। वह इसलिए दूर होने लगता है क्योंकि उसकी रुचि बदल गयी है। सामान्य मनुष्य बाहरी समस्याओं में रुचि रखता है — व्यवस्था, उपलब्धि, संबंध, प्रतिष्ठा, सुख। प्रेमी का प्रश्न अलग हो जाता है।

वह पूछता है:

  • दुःख किसको है?
  • कामना किसकी है?
  • जन्म किसका हुआ?
  • यह “मैं” क्या है?

यहीं से संसार और प्रेमी के बीच दूरी पैदा होती है।

संसार सूत्र चाहता है। उसे हर व्यक्ति के पीछे कोई न कोई कारण चाहिए। यदि कोई नाच रहा है, तो संसार पूछेगा — “क्यों?” यदि कोई त्याग कर रहा है, तो पूछा जाएगा — “क्या मिलेगा?” यदि कोई मौन है, तो पूछा जाएगा — “उद्देश्य क्या है?”

लेकिन प्रेमी का जीवन उद्देश्य-आधारित नहीं रहता। उसका जीवन प्रतिक्रिया नहीं, अभिव्यक्ति बन जाता है।

इसीलिए प्रेमी समाज को असुविधाजनक लगता है। क्योंकि समाज पूर्वानुमेय मनुष्य चाहता है। समाज को ऐसे लोग चाहिए जो निर्धारित ताल में चलें। प्रेमी उस ताल से बाहर चला जाता है।

यह विद्रोह नहीं है।
यह आंतरिक स्वतंत्रता है।

“जम्मणा जीणा मूल उखेड़े, बूझे अपणा आप खिआल।”

यहाँ बुल्लेशाह कहते हैं कि अब रुचि जीवन की सतही घटनाओं में नहीं रही। अब जिज्ञासा जीवन के मूल की ओर है। सामान्य व्यक्ति जीवन को सुधारना चाहता है। प्रेमी जीवन के आधार को समझना चाहता है।

सामान्य व्यक्ति पूछता है:

  • अधिक सुख कैसे मिले?
  • अधिक सुरक्षा कैसे मिले?
  • इच्छाएँ कैसे पूरी हों?

प्रेमी पूछता है:

  • इच्छाएँ किसे हैं?
  • भय किसका है?
  • यह “मैं” क्या है जो निरंतर संघर्ष कर रहा है?

यहीं से [[साक्षीत्व]] की संभावना जन्म लेती है।

कर्म, आज्ञा और आंतरिक स्वतंत्रता

समाज की आज्ञा → सकाम कर्म
आत्मा की दिशा → निष्काम कर्म

“जिसने वेश इश्क़ दा कीता, धुर दरबारों फतवा लीता।”

जब मनुष्य वास्तव में प्रेम के मार्ग पर चलता है, तब उसके कर्मों का आधार बदल जाता है। पहले उसके निर्णय समाज, भय, प्रतिष्ठा, तुलना और स्वीकृति से निर्धारित होते थे। अब वे भीतर की स्पष्टता से संचालित होने लगते हैं।

यहाँ “धुर दरबारों फतवा लीता” का अर्थ किसी बाहरी ईश्वर से आदेश लेना नहीं है। इसका अर्थ है — अब कर्म भीतर की सत्य-दृष्टि से निर्धारित होंगे।

गीता के सन्दर्भ में इसे दो स्तरों पर समझा जा सकता है:

संरचना अर्थ
कर्म संन्यास बाहरी दबावों की दासता का त्याग
कर्म योग सत्य के अनुसार कर्म करना

इस अवस्था में मनुष्य दूसरों को संतुष्ट करने के लिए नहीं जीता। वह वही करता है जो उसे अधिक स्पष्ट, अधिक सजग और अधिक स्वतंत्र बनाता है।

“जदों हजूरों प्याला पीता, कुछ न रह्या सवाल जवाब।”

जब चेतना मुक्ति के रस का स्वाद चख लेती है, तब बाहरी तर्कों का महत्व कम होने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बुद्धि समाप्त हो गयी। बल्कि अब बुद्धि संसार की स्वीकृति प्राप्त करने का साधन नहीं रही।

सवाल-जवाब वहीं तक चलते हैं जहाँ अहं को स्वयं को सिद्ध करना हो। लेकिन जिसने देख लिया कि उसकी मंज़िल भीतर है, वह अब हर व्यक्ति के सामने अपने जीवन को उचित ठहराने में ऊर्जा व्यर्थ नहीं करता।

यह निष्क्रियता नहीं है।
यह आंतरिक स्थिरता है।

प्राप्ति से अभिव्यक्ति की ओर

अहं → प्राप्ति
आत्मा → अभिव्यक्ति

सकाम कर्म → परिणाम
निष्काम कर्म → स्वाभाविक अभिव्यक्ति

“जिसदे अन्दर वस्स्या यार, उठिया यार ओ यार पुकार।”

जिसके भीतर आत्मा का बोध जागता है, उसके कर्मों की प्रकृति बदल जाती है। पहले जीवन प्राप्ति-केंद्रित था। अब वह अभिव्यक्ति-केंद्रित हो जाता है।

यह अंतर अत्यंत मौलिक है।

अहं हमेशा कुछ पाना चाहता है। उसका हर संबंध, हर कर्म, हर प्रयास किसी प्राप्ति के लिए होता है — धन, सुरक्षा, सम्मान, प्रेम, पहचान, सफलता। इसलिए उसका जीवन लगातार तनाव में रहता है।

लेकिन मुक्त पुरुष का जीवन प्राप्ति से संचालित नहीं होता। वह भीतर की पूर्णता की अभिव्यक्ति बन जाता है।

इसे सरल उदाहरण से समझा जा सकता है।

एक व्यक्ति किसी के पास इसलिए जाता है क्योंकि उसे उससे कुछ लाभ चाहिए। दूसरा व्यक्ति संगीत सुनकर स्वतः नृत्य करने लगता है। पहले कर्म के पीछे उद्देश्य है। दूसरे के पीछे आनंद की अभिव्यक्ति।

पहला सकाम कर्म है।
दूसरा निष्काम कर्म है।

इसीलिए कहा गया कि आत्मा आनंदस्वरूप है। जब अहं आत्मा के निकट आता है, तब जीवन में सहज नृत्य प्रकट होने लगता है। यहाँ नृत्य प्रतीक है — स्वाभाविकता का, अनायासता का, आंतरिक भारहीनता का।

[[अहंकार|अहं]] स्वयं नहीं नाचता। वह गणना करता है। तुलना करता है। परिणाम सोचता है। लेकिन जब वह आत्मा के सान्निध्य में ढीला पड़ता है, तब जीवन पहली बार सहज होने लगता है।

शिव सूत्र में कहा गया:

“आत्मा नर्तक है।”

इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा सचमुच कोई क्रिया कर रही है। अर्थ यह है कि जब चेतना विभाजन से मुक्त होती है, तब जीवन में सहज अभिव्यक्ति प्रकट होती है।

संसार इसे समझ नहीं पाता। क्योंकि संसार का पूरा ढाँचा उपयोगिता पर आधारित है। इसलिए वह पूछता है — “बिना कारण कोई कुछ क्यों करेगा?”

लेकिन प्रेमी का जीवन कारणरहित हो जाता है। उसका कर्म साधन नहीं रहता। वही उसका स्वभाव बन जाता है।

“ना ओह चाहे राग न तार, ऐवें बैठा खेडे हाल।”

यह “ऐवें” अत्यंत गहरा शब्द है। इसका अर्थ है — बिना प्रयोजन, बिना गणना, बिना उपलब्धि की भूख।

मुक्त पुरुष गीता पढ़ता है तो प्रसिद्धि के लिए नहीं। ध्यान करता है तो उपलब्धि के लिए नहीं। प्रेम करता है तो सुरक्षा के लिए नहीं। उसके कर्म अस्तित्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाते हैं।

सत्य का नगर और झूठ का अंत

सत्य → स्पष्टता
स्पष्टता → शांति
शांति → निष्कामता

“बुल्हिआ शाह नगर सच पाया, झूठा रौला सब्ब मुकाया।”

जब तक मनुष्य भीतर से विभाजित है, तब तक जीवन में निरंतर शोर बना रहता है। इच्छाओं का शोर, भय का शोर, तुलना का शोर, महत्वाकांक्षा का शोर। यह पूरा “रौला” अहं की अस्थिरता से उत्पन्न होता है।

लेकिन जब सत्य का स्पर्श होता है, तब बाहरी संसार बदलता नहीं — देखने वाला बदल जाता है। अब जीवन संघर्ष का मैदान नहीं रहता। वह बोध का क्षेत्र बन जाता है।

“सच्चियां कारण सच्च सुणाया, पाया उसदा पाक जमाल।”

यहाँ निष्काम कर्म की अंतिम परिभाषा उपस्थित है। सत्य ही कारण हो और सत्य ही कार्य — यही निष्कामता है।

यदि कोई सत्य इसलिए बोल रहा है कि उसे सम्मान मिलेगा, तो वह अभी भी सकाम है। यदि कोई आध्यात्मिकता इसलिए जी रहा है कि उसे विशेष माना जाए, तो वह अभी भी अहं के क्षेत्र में है।

लेकिन जहाँ सत्य केवल सत्य के लिए हो, वहाँ कर्म शुद्ध हो जाता है।

तब भीतर और बाहर के बीच विभाजन कम होने लगता है।

भीतर आत्मा है।
बाहर नृत्य है।

और दोनों अब विरोध में नहीं रहते।

अहं → प्राप्ति → संघर्ष → असंतोष

इश्क़ → आत्मा की ओर आकर्षण

आत्मा → अभिव्यक्ति → निष्कामता → शांति

सत्य ही कारण
सत्य ही कार्य
यही मुक्ति की दिशा है।