जो कुछ किसी और पर आश्रित हो, वह सत्य नहीं है

चूँकि निर्मित वस्तुओं के तीन लक्षण—उत्पत्ति, स्थिति और विनाश—का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, इसलिए न तो कुछ सशर्त है और न ही कुछ निःशर्त; वस्तुतः किसी भी तत्त्व का स्वभावतः अस्तित्व नहीं है। ~ छंद 30 – शून्यता सप्तति

जो कुछ किसी और पर आश्रित हो, वह सत्य नहीं है।

तुम → तुम दूसरे लोगों पर, ब्रह्मांड पर आश्रित हो; इसलिए असत्य हो।
समय → समय दूसरे पलों पर आश्रित है; इसलिए वह आश्रित है।
जन्म → जन्म तुम्हारे माता-पिता और भोजन पर आश्रित है; इसलिए वह असत्य है।
मरण → मरण तुम्हारे होने पर आश्रित है; इसलिए वह भी असत्य है।

न तुम पैदा हुए हो और न तुम मरोगे।
न तुम हो और न तुम नहीं-हो।
“हाँ” और “नहीं”—दोनों कहना गलत है।
बस सब मौन है, सब शून्य है ।

हाँ कहूँ तो है नहीं, नहीं कहा न जाए।
हाँ नहीं के बीच में, साहब रहा समाय॥ ~ कबीर साहब