AVALOKAN ताओ ते चिंग

ताओ ते चिंग अध्याय 15 — ज्ञानी का स्वरूप और ध्यान का अर्थ

ताओ ते चिंग – अध्याय 15

प्राचीन ज्ञानी गहरे और सूक्ष्म थे—
अथाह, समझ से परे।
जिन्हें शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।
उनकी व्याख्या करने का कोई तरीका नहीं है;
हम बस उनके बाहरी रूप की ही व्याख्या कर सकते हैं।

वे सावधान थे, जैसे जमी हुई नदी पार करते हुए।
सतर्क थे, जैसे शत्रु के घेरे में कोई योद्धा।
विनम्र थे, जैसे कोई मेहमान।
प्रवाही थे, जैसे पिघलती हुई बर्फ।
सरल थे, जैसे अनगढ़ लकड़ी का कुंदा।
खुले थे, जैसे घाटी।
शांत थे, जैसे मटमैला जल।

क्या आपमें वह ठहराव है कि आप स्थिर रहें,
जब तक कि मिट्टी नीचे न बैठ जाए और जल स्वच्छ न हो जाए?
क्या आप तब तक अविचल रह सकते हैं,
जब तक सही कर्म स्वतः ही प्रकट न हो जाए?

जो ताओ में स्थित हैं, वे पूर्णता नहीं खोजते।
वे अपेक्षाओं से मुक्त हैं, वर्तमान में जीते हैं।
वे सभी चीज़ों का स्वागत करते हैं।

ताओ ते चिंग के अध्याय 15 में प्राचीन ज्ञानी का वर्णन है। यह वर्णन रहस्य पैदा करने के लिए नहीं है, बल्कि मनुष्य को अपनी उलझनों का सीधा सामना करवाने के लिए है।

“प्राचीन ज्ञानी गहरे और सूक्ष्म थे— अथाह, समझ से परे।”

यहाँ “प्राचीन” का अर्थ केवल समय में पुराने लोग नहीं है। इसका अर्थ है — वे लोग जिनका मन बाहरी जटिलताओं से मुक्त था। आज विचारधाराएँ, पुस्तकें, तकनीक, मशीनें, मनोरंजन, असंख्य विकल्प — ये सब मन को लगातार उलझाए रखते हैं। पहले विकल्प कम थे, इसलिए मन का बिखराव भी कम था।

आज स्थिति उलट है।

  • विचारधाराएँ अनगिनत
  • मत-मतांतर अनंत
  • मनोरंजन के साधन असंख्य
  • पहचान बनाने के अवसर हजार

अहंकार को विषय चाहिए — और आज विषयों की बाढ़ है।


ध्यान क्या है? जोड़ना नहीं, हटाना

एक आम वाक्य है — “मैं दिव्य से जुड़ गया महसूस करता हूँ।”
यह सुनने में आध्यात्मिक लगता है, पर इसमें भी अहंकार छिपा है। “मैं जुड़ गया” — यानी अभी भी “मैं” बना हुआ है, बस उसका विषय बदल गया।

“ध्यान का अर्थ है — जो पकड़ा हुआ है, उसे छोड़ देना।”

ध्यान कोई उपलब्धि नहीं है।
ध्यान कोई अनुभव जोड़ना नहीं है।
ध्यान हटाना है।

जब मन सौ विषयों में बंटा हो, तो जीवन भी बिखरता है।
सौ विषय, और हर विषय आकर्षक — अहंकार तो भूखा है, वह हर दिशा में भागेगा।

जीवन का बिखराव

स्थिति परिणाम
कम विषय मन अपेक्षाकृत स्थिर
अधिक विषय मन बिखरा हुआ
आकर्षक विषय अहंकार का पोषण
विषयों का त्याग स्पष्टता

आज भटकने के इतने मार्ग हैं कि एक दिशा में सात दिन भी भटकें तो जीवन निकल सकता है। और फिर भी नया विषय सामने होगा।

इसलिए आज ध्यान कठिन है — क्योंकि विकल्प अनंत हैं।


“आँखें बंद क्यों की जाती हैं?”

आँख बंद करना कोई रहस्यवाद नहीं है। इसका सीधा अर्थ है — बाहर के विषयों को अस्थायी रूप से रोकना।

“चाहे हाथ में उठाया हो या मन में — बोझ तो बोझ है।”

दुनिया आपके लिए मिट जाए — यही ध्यान है।
ज्ञानी वह नहीं जो दुनिया से भाग गया।
ज्ञानी वह है जिसके भीतर दुनिया उठती तो है, पर टिकती नहीं।

ज्ञानी का चित्त

सामान्य व्यक्ति ज्ञानी
विषय आता है और चिपक जाता है विषय आता है और चला जाता है
चयन और पक्षपात समभाव
अपेक्षा स्वीकार
पकड़ प्रवाह

“जो ताओ में स्थित हैं, वे पूर्णता नहीं खोजते।”

पूर्णता खोजने का अर्थ है — अभी कुछ कमी मान लेना। ज्ञानी वर्तमान को अस्वीकार नहीं करता।


क्या ध्यान कोई विशेष विधि है?

आज ध्यान की दर्जनों तकनीकें हैं। पर तकनीक भी अहंकार को आकर्षित कर सकती है — जैसे दुकान का सामान।

पहले इतने तरीके नहीं थे।
पहले विषय कम थे — इसलिए रोकना आसान था।

ध्यान का अर्थ है — जो कर रहे हो, उसे रोक दो।


भागना नहीं, फँसना नहीं

एक भ्रम है — या तो संसार से भागो, या उसे पकड़कर डूब जाओ। दोनों गलत हैं।

“संसार से भागो मत — पर गटर में हो तो वहीं पड़े मत रहो।”

यह संतुलन है।

क्या करना है, क्या नहीं करना है

क्या करना है क्या नहीं करना है
विषयों को देखना विषयों से चिपकना
आवश्यक कर्म करना व्यर्थ उलझना
सजग रहना भाग जाना
सम होना दास बन जाना

ऋषि साफ स्थान क्यों खोजते थे?
क्योंकि स्थान भी विषय है।
जब अनावश्यक विषय हटाने हों, तो वातावरण भी सहायक होना चाहिए।


“जिन्हें शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता…”

“हम बस उनके बाहरी रूप की ही व्याख्या कर सकते हैं।”

क्यों?
क्योंकि भीतर कोई स्थायी “वस्तु” नहीं है जिसे पकड़ा जा सके।
जब कुछ ठोस नहीं है, तो उसे परिभाषित कैसे करेंगे?

यदि कुछ अचिंत्य है — तो उसका अर्थ है कि वह “वस्तु” नहीं है।
ज्ञान जोड़ने से नहीं आता।
ज्ञान हटाने से आता है।

“यह मत कहो कि कुछ मिला — कहो कि कुछ मिट गया।”

हम यहाँ जोड़ने नहीं आए हैं।
हम हटाने आए हैं।


प्रश्नोत्तर (सत्र के बाद)

प्रश्न 1: बड़ा–छोटा, हीन–श्रेष्ठ — क्या ये वास्तविक भेद हैं?

उत्तर:
ये अवधारणाएँ हैं। तुलना के बिना ये टिकती नहीं।

जब मन सम हो जाता है, तब बड़ा और छोटा केवल व्यावहारिक शब्द रह जाते हैं — आंतरिक सत्य नहीं।

“आईने में अपने को देखकर हँसो।”
अहंकार हल्का रहेगा।


प्रश्न 2: क्या वृत्तियाँ (प्रवृत्तियाँ) बाधा हैं?

उत्तर:
वृत्ति प्रकृति है। समस्या वृत्ति नहीं — उससे जुड़ा अहंकार है।

वृत्ति का रूपांतरण

पहले बाद में
गुस्सा अहंकार पर चोट से गुस्सा अन्याय पर
आकर्षण भोग के लिए आकर्षण सत्य के लिए
साहस स्वार्थ के लिए साहस धर्म के लिए

वृत्ति मिटती नहीं, उसका आयाम बदलता है।

उदाहरण के रूप में मीराबाई का आकर्षण भोग से हटकर भक्ति की दिशा में गया। प्रवृत्ति रही, केंद्र बदल गया।


प्रश्न 3: नींद, थकान या बहाने — क्या ये वास्तविक बाधाएँ हैं?

उत्तर:
शरीर अपना काम करता है। समस्या तब है जब अहंकार उसे बहाना बना ले।

यदि आवश्यक कार्य के समय ही थकान आए, तो जाँचें — क्या यह टालना है?

अक्सर काम छोड़ते ही थकान कम हो जाती है। इसका अर्थ है कि समस्या शरीर नहीं, मन था।


अंतिम स्पष्टता

ध्यान कोई अवस्था नहीं है।
ध्यान अहंकार का लोप है।

जब अहंकार को कोई विषय नहीं मिलता —
तब जो शेष है, वही शांति है।

“कुछ जोड़ना नहीं है।
जो झूठा है, उसे हटाना है।”

सत्य पहले से है।
उसे लाना नहीं — केवल रास्ता साफ करना है।