दुःख

दुःख ही प्रेम का प्रमाण है; जहाँ प्रेम है, वहीं पीड़ा है।

मूल विचार
[[दुःख]] = [[प्रेम]] का संकेत
दुःख शत्रु नहीं — मुक्ति की चाह का प्रमाण है।

व्याख्या
यदि मनुष्य को स्वतंत्रता से प्रेम न होता, तो बंधन उसे खलता नहीं।
मुर्दे को बेड़ियाँ स्वीकार्य हैं, क्योंकि उसमें चाह नहीं है।
जीव को दुःख इसलिए है क्योंकि उसका स्वभाव [[मुक्ति]] है।
अतः दुःख अभाव का प्रमाण नहीं, भीतर छिपे प्रेम का उद्घाटन है।

मुख्य बिंदु

  • जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ पीड़ा नहीं

  • दुःख स्वभाव-विरोधी जीवन का संकेत है

  • मुक्ति की चाह ही असंतोष का कारण है

  • प्रेम ही खोज की शुरुआत करता है

एक पंक्ति सार
दुःख मुक्ति-विहीनता नहीं, मुक्ति-प्रेम का प्रमाण है।

संबंधित अवधारणाएँ
[[प्रेम]]
[[मुक्ति]]