नोकरी माने क्या
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नौकरी माने क्या?
“नौकरी वह व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति अपना समय, कौशल और ऊर्जा देकर बदले में सुरक्षा और साधन प्राप्त करता है।”
व्याख्या:
नौकरी केवल पैसे कमाने का माध्यम नहीं है।
नौकरी जीवन-ऊर्जा का विनिमय है।
- समय दिया जाता है।
- श्रम दिया जाता है।
- बुद्धि और कौशल लगाया जाता है।
बदले में वेतन, सुविधा और सामाजिक पहचान मिलती है।
नौकरी स्वयं समस्या नहीं है।
समस्या तब होती है जब नौकरी ही पहचान बन जाती है।
“मैं क्या करता हूँ” धीरे-धीरे
“मैं कौन हूँ” बन जाता है।
यहीं से बंधन शुरू होता है।
नौकरी की प्रकृति
“नौकरी = भूमिका, पहचान नहीं।”
भूमिका बदल सकती है।
कंपनी बदल सकती है।
पद बदल सकता है।
लेकिन जो इन सब भूमिकाओं को निभा रहा है —
वह इनसे बड़ा है।
जब नौकरी साधन है,
तो संतुलन है।
जब नौकरी आत्म-मूल्य का आधार बन जाती है,
तो तनाव है।
आध्यात्मिक अर्थ
नौकरी बाहरी कर्म है।
भीतर का केंद्र [[आत्मा]] है।
यदि कर्म का आधार [[अहंकार]] है —
तो तुलना, भय और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
यदि कर्म का आधार सजगता है —
तो वही नौकरी साधना बन सकती है।
नौकरी में भी [[होश]] संभव है।
काम करते हुए भी भीतर [[समत्व]] संभव है।
मुक्ति नौकरी छोड़ने में नहीं,
नौकरी में खो न जाने में है।
सार
नौकरी जीविका का माध्यम है,
जीवन का उद्देश्य नहीं।
भूमिका निभाओ —
पर भूमिका मत बनो।
कर्म करो —
पर स्वयं को कर्म तक सीमित मत करो।