पौरुष
कर्तृत्व का त्याग → प्रकृति पर विश्वास → समत्व → पौरुष
पौरुष शक्ति नहीं है; अहंकार का विसर्जन है।
सामान्य धारणा:
- “मैं कर रहा हूँ” → पौरुष
वास्तविकता:
- “प्रकृति कर रही है” → पौरुष
यह निष्क्रियता नहीं है, बल्कि गहरी समझ है कि:
- शरीर प्रकृति है
- मन प्रकृति है
- क्रिया प्रकृति है
तब “मैं” कहाँ है?
जहाँ कर्ता मिटता है, वहीं वास्तविक पौरुष प्रकट होता है।