प्रकृति
अनुभव्य, अनुभोक्ता और अनुभव — तीन नहीं, एक ही प्रक्रिया हैं।
मूल विचार
अनुभव्य–अनुभोक्ता–अनुभव = [[प्रकृति]] की त्रयी
द्वैत मानसिक विभाजन है, स्वतंत्र सत्ता नहीं।
व्याख्या
जो देखा जा रहा है, जो देख रहा है, और देखने की क्रिया — ये अलग-अलग प्रतीत होते हैं।
परंतु यह विभाजन चेतना की संरचना है।
जब तक “मैं” स्वयं को अलग मानता है, तब तक यह त्रिभाजन बना रहता है।
इस एकता का बोध होते ही द्वैत की नींव हिल जाती है।
मुख्य बिंदु
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दृश्य–द्रष्टा–दर्शन एक ही तंत्र है
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ज्ञेय–ज्ञाता–ज्ञान पृथक सत्ता नहीं
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विभाजन अनुभव की शैली है
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एकत्व का बोध सीमा को तोड़ता है
एक पंक्ति सार
अनुभव की त्रयी ही प्रकृति है — अलग सत्ता नहीं।
संबंधित अवधारणाएँ
[[प्रकृति]]
[[द्वैत]]
[[अद्वैत]]