प्रेम

प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम ने चिन्हे कोय। जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।।

परिभाषा
प्रेम = सत्य के प्रति निष्ठा।
प्रेम = “मैं न रहूँ, तू रहे।”

लक्षण

  • निर्णय है
  • न्योछावर होना
  • खुद से ऊब से शुरुआत

वेदान्त दृष्टि
“तू तू करता तू हुआ” — परम में विलय
जिस तन लगिया इश्क कमाल || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर

संबंधित अवधारणाएँ
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[[श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 47 — जो केवल कृष्ण को ही भजते हैं, वही सर्वश्रेष्ठ योगी हैं#“प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाही।”|प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाही]]
[[अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर की सैर]]
[[The Little Prince — What Adults Forget - Lessons on Love and Conditioning]]
[[इश्क़ है आसमां में उड़ के जाना]]
[[हमन है इश्क मस्ताना]]
[[जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल]]