AVALOKAN प्रेम BASIC WISDOM

प्रेम न्यौछावर होने की तैयारी है — भक्तिसूत्र भाग 2

भूमिका : भक्ति का उद्घोष — प्रेम ही आरम्भ, प्रेम ही अंत

सूत्र १ → भक्ति की व्याख्या
सूत्र २ → परम प्रेम
सूत्र ३ → अमृतस्वरूप
आरम्भ = प्रेम
अंत = प्रेम

नारद कहते हैं —
“अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।”
अब भक्ति की व्याख्या करेंगे।

और तुरंत ही स्पष्ट कर देते हैं —
“सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।”
वह परम के प्रति [[परमप्रेम]] है।
फिर जोड़ते हैं —
“अमृतस्वरूपा च।”
वह अमृतस्वरूप है।

यहाँ भक्ति किसी पद्धति का नाम नहीं है, न ही कोई धार्मिक कर्मकाण्ड। उसका आरम्भ भी प्रेम है और उसका फल भी प्रेम है। वह साधन भी प्रेम है और साध्य भी प्रेम। इसलिए भक्ति का मार्ग वृत्ताकार है — जहाँ से चलो, वहीं लौटते हो, पर बदले हुए।

यदि प्रेम नहीं है, तो भक्ति का दावा केवल शब्द है। यदि प्रेम है, तो भक्ति पहले से घट रही है।


भक्ति और कामना : व्यापार या समर्पण?

कामना → फल की अपेक्षा → प्रकृति से बंधन
निरोध → त्याग → प्रकृति से उदासीनता

सूत्र कहता है —
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।”
भक्ति कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह [[निरोध]] स्वरूप है।

जहाँ कामना है, वहाँ लेन-देन है। जहाँ लेन-देन है, वहाँ प्रेम नहीं, व्यापार है।

कबीर कहते हैं:
“फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम।
कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौहुना दाम॥”

यदि तुम पूजा इसलिए करते हो कि बदले में शांति मिले, सफलता मिले, सुरक्षा मिले — तो तुम अभी भी [[प्रकृति]] के भीतर ही घूम रहे हो। तुम रंगों में उलझे हो, स्रोत को नहीं खोज रहे।

भक्ति व्यापार
निष्काम सकाम
समर्पण लेन-देन
त्याग अपेक्षा

कामना का अर्थ है — मैं प्रकृति से संबंध बना रहा हूँ। निरोध का अर्थ है — मैं प्रकृति के आकर्षण से पीछे हट रहा हूँ।


अनन्यता और अन्याश्रय त्याग

प्रकृति → अनेक आश्रय
भक्ति → एकमात्र आश्रय
अनन्यता = अन्याश्रय त्याग

सूत्र कहता है —
“तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता।”
और
“अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता।”

अनन्यता का अर्थ है — दूसरे सहारों का त्याग।
जब तक मन कई जगह सिर झुकाता है, तब तक समर्पण अधूरा है।

यदि तुम संसार से भी आश्रय चाहते हो और परम से भी, तो तुम विभाजित हो।
भक्ति विभाजन नहीं सहती।

कर्म प्रायः फल के लिए होता है। फल प्रकृति में मिलता है। इसलिए फल-आकांक्षा तुम्हें प्रकृति में बाँधे रखती है। निष्कामता बिना [[ज्ञान]] के संभव नहीं, और निष्काम कर्म ही सच्ची भक्ति है।


भक्ति की विभिन्न धारणाएँ — और उनका शोधन

पूजा → अनुराग
कथा → अनुराग
सत्संग → अनुराग
परंतु
समर्पण → सर्वोच्च

पाराशर कहते हैं — पूजा में अनुराग।
गर्ग कहते हैं — कथा में अनुराग।
शाण्डिल्य कहते हैं — आत्मानन्द के विरोध बिना प्रेम।
नारद कहते हैं — सब कर्म अर्पित कर देना और विस्मरण पर व्याकुल हो जाना।

यहाँ एक प्रगति है — बाहरी क्रिया से भीतरी समर्पण तक।

बाह्य रूप आंतरिक सार
पूजा स्मरण
कथा एकाग्रता
सत्संग दिशा
समर्पण पूर्ण अर्पण

यदि समर्पण नहीं, तो पूजा मनोरंजन बन जाती है।

कबीर चेतावनी देते हैं:
“भक्ति भक्ति सब कहे, भक्ति न आई काज।”

सगुण भक्ति प्रारम्भ हो सकती है, पर यदि वह सकाम है तो वहीं रुक जाती है। मन अपनी छवि गढ़ता है और उसी से प्रेम करता है — यह [[अहं]] का विस्तार है, भक्ति नहीं।


कबीर की चेतावनी : भक्ति का छल

सकाम भक्ति → व्यापार  
दिखावटी भक्ति → मनोरंजन  
लोभ → पतन  
अधूरा समर्पण → आत्म-छल

अब कबीर को एक साथ सुनो — क्रम में, प्रहार में।

“और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निष्कर्म।
कहे कबीर पुकारी के, भक्ति करो ताजि भ्रम॥” ~ कबीर

यह चेतावनी है सगुण भक्ति में अटकने वालों के लिए।

“भक्ति भक्ति सब कहे, भक्ति न आई काज।
जिसको कियो भरोसवा, तेही त्याई गाज॥” ~ कबीर

भरोसे पर दुख आता है क्योंकि सगुण भक्ति प्रकृति मात्र है, मन की छवि पर निर्भर।

“देखि देखि भक्ति का, कबहुँ न चढ़त रंग,
विपत्ति पड़े यूँ छड़ी के, केंचुली तजत भुजंग।” ~ कबीर

देखते-देखते भक्त नहीं बनता, विपत्ति में भक्ति छूट जाती है।

“टोटे में भक्ति करे, ताका नाम सबूत।
मायाधारी मस्खरे केते गये अवतूत॥” ~ कबीर

भक्ति के नाम पर मनोरंजन करने वाले आते-जाते रहते हैं, असली भक्ति मन को कम करके होती है।

“ज्ञान सपूर्ण ना हुआ, हिरदा नहीं जुड़ाए।
देखा देखि भक्ति का रंग नहीं ठहराए॥” ~ कबीर

अपूर्ण ज्ञान से हृदय एक नहीं होता, देखी भक्ति टिकती नहीं।

“खेत बिगाड़ी खुरतूआ, सभा बिगाड़ी कूर।
भक्ति बिगाड़ी लालची जो केसर में धूर॥” ~ कबीर

लालच भक्ति को खराब कर देता है, जैसे धूल केसर को बर्बाद करती है।

“जब तक भक्ति सकाम है, हम तक निष्फल सेव।
कहे कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी निज देव॥” ~ कबीर

सकाम भक्ति निष्फल है, निष्काम भक्ति से ही देव मिलते हैं।

दूसरों को देखकर भक्ति नहीं होती।

यह पूरा प्रहार किस पर है?
सकाम भक्ति पर।
दिखावटी भक्ति पर।
लोभी भक्ति पर।
आधे समर्पण पर।
और सबसे बढ़कर — [[अहं]] के छल पर।


माहात्म्यज्ञान और गोपियों का उदाहरण

प्रेम
   +
माहात्म्यज्ञान
   =
सच्ची भक्ति

सूत्र कहता है —
“यथा व्रजगोपिकानाम्।”
परन्तु
“न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः।”

गोपियों का प्रेम उन्मत्त था, पर अज्ञान नहीं था। वे भूलती नहीं थीं कि सामने कौन है।

यदि प्रेम में महत्ता का ज्ञान नहीं, तो वह आसक्ति है।
सूत्र कहता है —
“तद्विहीनं जाराणामिव।”
माहात्म्यज्ञान बिना प्रेम व्यभिचार जैसा है।

सच्चा प्रेम आसक्ति
एकनिष्ठ बहु-दिशात्मक
समर्पित स्वार्थयुक्त
स्व-विस्मृति स्व-केन्द्रित

समर्पण का अर्थ है — पहले से कहीं और सिर न झुकाया हो। यदि तुम संसार को पहले ही सब दे चुके हो, तो फिर परम को क्या दोगे?


भक्ति : कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ

कर्म → शुद्धि
ज्ञान → बोध
भक्ति → परिवर्तन

सूत्र कहता है —
“सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा।”

क्यों? क्योंकि वह [[प्रेम]] है।

ज्ञान बता सकता है कि “मैं मिथ्या हूँ।”
पर यह छोड़ोगे कैसे?
बौद्धिक समझ पर्याप्त नहीं।

ज्ञान बिना प्रेम ज्ञान सहित प्रेम
सूचना परिवर्तन
तर्क आतुरता
विचार विसर्जन

प्रेम ही आतुरता देता है। प्रेम ही भीतर बेचैनी जगाता है। प्रेम के बिना ज्ञान शुष्क रहता है।


भक्ति स्वयं फल है

साधन = प्रेम
साध्य = प्रेम
मुक्ति ⊂ प्रेम

सूत्र कहता है —
“फलरूपत्वात्।”

भक्ति किसी फल के लिए नहीं। वह स्वयं फल है।

यदि तुम मुक्ति के लिए प्रेम कर रहे हो, तो अभी भी सौदा कर रहे हो।
प्रेम में कुछ नहीं चाहिए।

प्रेम में मुक्ति सम्मिलित है। मुक्ति प्रेम का उपफल है, लक्ष्य नहीं।


प्रेम और उन्मत्तता

ज्ञान (सुनना)
       ↓
समझ
       ↓
यदि प्रेम नहीं → ठहराव

ज्ञान + प्रेम
       ↓
आतुरता
       ↓
परिवर्तन

कोरा ज्ञान हाथ में सूचना बढ़ाता है।
प्रेम हाथ खाली करता है।

जो केवल जानकारी इकट्ठी करता है, वह कह रहा है — “मैं जैसा हूँ वैसा ही रहूँगा।”
पर प्रेम कहता है — “मैं बदलने को तैयार हूँ।”

भक्ति में थोड़ी [[उन्मत्तता]] चाहिए — एक आतुरता, एक झूम।
यांत्रिक व्यक्ति सफल हो सकता है, पर जीवित नहीं।

यांत्रिक जीवन प्रेमपूर्ण जीवन
पूर्व-निर्धारित जीवंत
सुरक्षित जोखिमपूर्ण
बुद्धिसंगत समर्पित

दीवार लाँघने के लिए सनक चाहिए। प्रेम वह सनक देता है।

यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहीं।
सीस उतारे भुई धरे, तब घर बैठे माहि।


साधन : संगति और त्याग

साधुसंग → कृपा → प्रेम जागरण
दुसंग → काम → क्रोध → मोह → विनाश

सूत्र कहता है —
“साधुसङ्गः।”
और
“दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः।”

सत्संग दुर्लभ है।
पर लक्ष्य के प्रति प्रेम तुम्हारे हाथ में है।

दुसंग वह है जो तुम्हें प्रकृति में और गाड़ दे।
काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश — यह पतन की श्रृंखला है।

सत्संग दुसंग
स्मरण विस्मरण
ऊर्ध्वगति अधोगति
सजगता मोह

अनुराग : ज्ञान की शर्त

अनुराग → समर्पण की तैयारी → ज्ञान का अवतरण

“जाके चित्त अनुराग है, ज्ञान मिले नर सोई।”

यदि जीवन नहीं बदल रहा, तो अनुराग नहीं है।
प्रेम का अर्थ है — न्योछावर होने की तैयारी।

जब तक जान देने की तैयारी नहीं, तब तक प्रेम नहीं।
जब तक मिटने की तैयारी नहीं, तब तक [[अहंकार]] बचा हुआ है।

“मैं” बीच में खड़ा है और कहता है — “मैं समर्पित कर रहा हूँ।”
पर समर्पण का अर्थ है — “मैं” का विसर्जन।


निष्कर्ष : प्रेम ही अद्वैत का द्वार

अहं
  ↓
समर्पण
  ↓
प्रेम
  ↓
अद्वैत

भक्ति कोई भावनात्मक अभ्यास नहीं है।
वह अस्तित्वगत क्रांति है।

जहाँ प्रेम है, वहाँ द्वैत टूटने लगता है।
जहाँ समर्पण है, वहाँ “मैं” ढीला पड़ता है।
जहाँ “मैं” ढीला पड़ा, वहाँ [[अद्वैत]] की झलक है।

प्रेम बिना जियोगे कैसे?
प्रेम ही जीवन को अर्थ देता है, दिशा देता है, और अंततः स्वयं को मिटा देता है।

भक्ति का रहस्य गुप्त इसलिए है क्योंकि सब चाहते हैं फल, पर कोई मिटना नहीं चाहता।

और जब तक मिटने की तैयारी नहीं —
तब तक प्रेम नहीं।

प्रेम में कुछ माँगना नहीं पड़ता।
जहाँ प्रेम पूर्ण है, वहाँ मुक्ति पहले से उपस्थित है।