प्रेम माने क्या
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प्रेम माने क्या?
“प्रेम = सत्य के प्रति निष्ठा।
प्रेम = ‘मैं न रहूँ, तू रहे।’”
“जीवन ही प्रेम है।”
व्याख्या:
प्रेम भावना नहीं है।
प्रेम आकर्षण नहीं है।
प्रेम किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है।
प्रेम का अर्थ है — सत्य के आगे झुक जाना।
जहाँ “मैं” की जिद कम हो जाए,
और सत्य का स्थान प्रधान हो जाए — वही प्रेम है।
“मैं न रहूँ, तू रहे” —
यह किसी दूसरे व्यक्ति के लिए नहीं,
यह अहं के विलय की घोषणा है।
प्रेम की दिशा
“अहं का आत्मा, असत्य का सत्य, होने का न होना।”
अहं का [[राम]] —
अर्थात् सीमित पहचान का असीम में समर्पण।
बंधन का मुक्ति —
अर्थात् पकड़ का ढीला पड़ जाना।
आकार का निराकार,
मूर्त का अमूर्त —
जो सीमित है, उसका असीम में विलय।
इन सबकी चाहना ही प्रेम है।
प्रेम किसी वस्तु को पाना नहीं चाहता,
वह स्वयं को खोना चाहता है।
आध्यात्मिक अर्थ
प्रेम का केंद्र बाहर नहीं — भीतर है।
“मेरे केंद्र में आत्मप्रेम है,
और मेरे सारे कर्म आत्मा की अभिव्यक्ति मात्र हैं।”
जब व्यक्ति स्वयं को [[आत्मा]] रूप में जानता है,
तो उसका प्रेम स्वामित्व नहीं बनता।
वह निर्भरता नहीं बनता।
वह अपेक्षा नहीं बनता।
प्रेम तब संबंध नहीं,
स्वभाव बन जाता है।
जहाँ [[अहंकार]] है, वहाँ मांग है।
जहाँ प्रेम है, वहाँ समर्पण है।
सार
प्रेम भावना नहीं — अस्तित्व है।
प्रेम में “मैं” छोटा होता है,
और सत्य प्रकट होता है।
प्रेम पाने की वस्तु नहीं,
पहचान बदलने की अवस्था है।
जब “मैं” हटता है —
प्रेम शेष रहता है।