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प्रेम ही पथ है: भक्ति और ज्ञान की आंतरिक एकता — भक्तिसूत्र भाग 1

भक्ति और ज्ञान की साझा भूमि: दुःख से मुक्ति की खोज

दुःख का अनुभव
      ↓
प्रकृति का प्रभाव
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मुक्ति की चाह
      ↓
भक्ति  |  ज्ञान

भक्ति और ज्ञान—ये दो मार्ग प्रायः अलग समझे जाते हैं, परंतु उनकी शुरुआत एक ही स्थान से होती है: [[दुःख]] के अनुभव से। जब मनुष्य स्वयं को [[प्रकृति]] के प्रभाव में पाता है—परिस्थितियों, संबंधों, सामाजिक अपेक्षाओं और मानसिक प्रतिक्रियाओं से घिरा हुआ—तब उसे अपनी असहजता का बोध होता है। वह सहज नहीं है। वह स्वतंत्र नहीं है। वह केवल “पैदा होने का दंड” भोग रहा है।

यही पहला सत्य है। न वह अभी भक्त है, न ज्ञानी। वह केवल एक ऐसा जीव है जो दबाव अनुभव कर रहा है। संसार कहता है, “सब ऐसे ही जीते हैं, तुम भी ऐसे ही चलो।” परंतु भीतर कोई स्वर कहता है—“यह मेरा स्वभाव नहीं है।” यही आंतरिक असंतोष [[मुक्ति]] की पुकार है।

यदि मनुष्य को मुक्ति से प्रेम न होता, तो वह दुःख अनुभव ही न करता। मुर्दे के हाथ में बेड़ियाँ डाल दीजिए—उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। क्यों? क्योंकि उसमें [[प्रेम]] नहीं है। जहाँ प्रेम है, वहीं पीड़ा है। हम आनंद से प्रेम करते हैं, इसीलिए दुःख असह्य है। अतः यह कहना कि “दुःख ही प्रेम का प्रमाण है” अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सत्य है।


अनुभव्य, अनुभोक्ता और अनुभव: त्रयी की एकता

अनुभव्य
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अनुभोक्ता
     ↓
अनुभव

तीनों = प्रकृति

भक्त और ज्ञानी दोनों ही प्रारंभ में प्रकृति से त्रस्त हैं। परंतु उनका दृष्टिकोण भिन्न हो जाता है। भक्त भागता है—वह “अद्वैत पिता” की शरण में जाना चाहता है। ज्ञानी रुकता है—वह मुखौटे उतारना चाहता है।

परंतु यहाँ एक मूल सिद्धांत है: “Abuser, the Abused, and the Abuse are one.” अर्थात् अनुभव्य, अनुभोक्ता और अनुभव—ये तीनों अलग-अलग सत्ता नहीं हैं। यही त्रयी [[प्रकृति]] है।

त्रयी अर्थ
अनुभव्य जो अनुभव किया जा रहा है
अनुभोक्ता जो अनुभव कर रहा है
अनुभव दोनों के बीच की क्रिया

इसी प्रकार:

ज्ञान संरचना एकता
ज्ञेय ज्ञाता
दृश्य द्रष्टा

ये तीनों पृथक प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में एक ही प्रक्रिया के भिन्न आयाम हैं। जब तक “मैं” बना हुआ है, तब तक यह त्रिभाजन बना रहेगा। और जब तक यह त्रिभाजन है, तब तक सीमा और दुःख भी रहेंगे।

भक्त यदि इस त्रयी को समझे बिना भागेगा, तो वह परम को भी अपनी कल्पनाओं के भीतर खींच लेगा। वह अपने गुण-दोष, अपनी कहानियाँ, अपने मनोभाव—सब भगवान पर आरोपित कर देगा। तब भक्ति शुद्ध नहीं रहेगी; वह मनोवैज्ञानिक विस्तार बन जाएगी।


भक्ति की प्रामाणिकता और उसकी संभावित त्रुटि

मैं + विषय
      ↓
मेरा भगवान भी वैसा ही
      ↓
समर्पण या प्रक्षेपण?

सच्चा भक्त जानता है कि परम [[प्रकृति]] से परे है। यदि परम भी समाज जैसा हो, तो वह परम कैसे हुआ? परंतु व्यवहार में अधिकांश भक्त अपने संबंधों की संरचना को ही ईश्वर पर आरोपित कर देते हैं।

यदि मैं पिता हूँ—तो ईश्वर को पुत्र बना लेता हूँ।
यदि मैं पति हूँ—तो ईश्वर को प्रेयसी बना लेता हूँ।
यदि मैं दास हूँ—तो स्वयं को ईश्वर का सेवक बना देता हूँ।

यह झूठ नहीं है; यह मनोवैज्ञानिक ईमानदारी है। भक्त अपने स्वभाव को नकार नहीं सकता। इसलिए वह कहता है—“मेरा सबसे प्रिय विषय अब से तुम्हारा है।” वह विषय को मिटा नहीं पाता; उसे समर्पित कर देता है।

परंतु यहाँ भी भ्रम संभव है। कई बार भक्ति केवल संसारिक मनोरंजन का धार्मिक रूप बन जाती है—वही आसक्ति, वही नाटक, केवल पात्र बदल गया। यह भक्ति नहीं, विस्तार है।

सच्ची भक्ति की गति है:

गति → ज्ञान → समर्पण

पहले हृदय गति करता है, फिर बुद्धि स्पष्ट करती है, और अंततः समर्पण होता है।


ज्ञान मार्ग: मुखौटों का उद्घाटन

जिज्ञासा
     ↓
संघर्ष
     ↓
मुखौटा उतारना
     ↓
शून्यता का बोध

ज्ञानी भागता नहीं। वह भिड़ता है। वह कहता है—“मैं मुखौटा उतारूँगा।” जानना ही मुखौटा उतारना है। यह मार्ग संघर्षपूर्ण है। क्योंकि यहाँ व्यक्ति को न केवल समाज से, बल्कि स्वयं से भिड़ना पड़ता है।

ज्ञानी समझता है कि यदि एक भी तत्व का यथार्थ जान लिया, तो समग्र अस्तित्व का यथार्थ जान लिया। किसी ने कहा था—“यदि एक कण को जानना है, तो पूरे ब्रह्मांड को जानना होगा।” और उल्टा भी सत्य है—एक कण को सही में जान लिया, तो ब्रह्मांड जाना गया।

यहाँ [[अनात्म]] का बोध होता है—प्रतीति है, पर तत्व नहीं। दिखाई पड़ता है, सुनाई देता है, अनुभव में आता है—परंतु स्वतंत्र सत्ता नहीं है।

परंतु ज्ञान मार्ग में भी धोखा संभव है। ज्ञानी कह सकता है—“मैंने सबको हरा दिया।” यदि “मैं” शेष है, तो जगत भी शेष है। अतः अंतिम प्रहार स्वयं पर करना पड़ता है।


भक्ति और ज्ञान का निर्णायक भेद

मैं + विषय = जीव

भक्ति → विषय का विसर्जन  
ज्ञान → "मैं" का विसर्जन
मार्ग क्या छोड़ता है
भक्ति विषय को समर्पित करता है
ज्ञान “मैं” को नेति-नेति से विसर्जित करता है

भक्ति में मधुरता है। यहाँ रक्त नहीं बहता; यहाँ प्रिय का समर्पण है। इसीलिए यह मार्ग अधिक प्रचलित रहा है। संघर्ष का मार्ग सबको स्वीकार्य नहीं होता।

ज्ञान मार्ग को [[रमण महर्षि]] ने “direct path” कहा—सबसे सीधा, सबसे त्वरित। परंतु यह साहस मांगता है। यहाँ आत्महत्या रूपी विसर्जन है—अहं का संपूर्ण अंत। ज्ञानी कहता है—“मैं मिटने नहीं, मिलने जा रहा हूँ।”

परंतु [[प्रेम]] दोनों की जड़ है। बिना प्रेम के भक्त गति नहीं करेगा, और ज्ञानी संघर्ष नहीं करेगा। इसी से कहा गया—“भक्ति ज्ञान की माता है।”


मुखौटे और दृष्टि का भ्रम

आँख में धूल
      ↓
जो है वह नहीं दिखता
      ↓
जो नहीं है वह दिखता है

मुखौटे वास्तव में किस पर थे? किसी पर नहीं। वे केवल दृष्टि की विकृति थे। यदि आँख में तिनका चला जाए, तो सामने पर्वत प्रतीत होता है।

“रेत का कण विशाल इतना है,
रेत आगे समुंदर छिप जाता।”

जीवन की छोटी-छोटी आसक्तियाँ—रेत के कण—इतनी बढ़ जाती हैं कि समग्र अस्तित्व छिप जाता है। समस्या वस्तु में नहीं, दृष्टि में है।

हम उसी से प्रेम करने लगते हैं जो हमारा स्वभाव छीन लेता है। आँख यदि धूल से प्रेम करे, तो देखना खो देगी। जीव का स्वभाव [[मुक्ति]] है, पर वह उन्हीं से चिपकता है जो उसकी स्वतंत्रता छीनते हैं।


सगुण और निर्गुण की अंतिम एकता

सगुण भक्ति
      ↓
ममत्व

निर्गुण भक्ति
      ↓
एकत्व

साधारण व्यक्ति सगुण से प्रारंभ करता है, क्योंकि उसका समस्त अनुभव सगुण का है। वह ईश्वर को भी रूप, गुण और संबंध देता है। इसमें दोष नहीं; यह उसकी मनोवैज्ञानिक भूमि है।

परंतु जब भक्ति अस्तित्व की सीमा पर पहुँचती है, तब ज्ञात होता है कि परम भीतर नहीं समाता। यहाँ ममत्व टूटता है और एकत्व प्रकट होता है।

[[कबीर]] ने निर्गुण की ओर संकेत किया। सगुण में “मैं” और “मेरा” रहता है; निर्गुण में भेद विलीन हो जाता है।

कहानी है कि [[मीरा बाई]] को एक आश्रम में प्रवेश नहीं मिला क्योंकि वहाँ केवल पुरुष थे। उन्होंने कहा—“मुझे तो लगा पुरुष तो एक ही होता है।” यह कथन दार्शनिक है। जहाँ आत्मज्ञान नहीं, वहाँ स्त्री-पुरुष का भेद रहेगा। जहाँ आत्मबोध है, वहाँ सब एक है।


निष्कर्ष: द्वैत से अद्वैत की यात्रा

दुःख
   ↓
प्रेम
   ↓
खोज
   ↓
भक्ति या ज्ञान
   ↓
अद्वैत

अंततः दोनों मार्ग द्वैत से अद्वैत की ओर हैं। एक मधुर समर्पण से चलता है, दूसरा तीक्ष्ण विवेक से। एक विषय छोड़ता है, दूसरा “मैं”। परंतु दोनों में प्रेम अनिवार्य है।

जब अनुभव्य, अनुभोक्ता और अनुभव की त्रयी एक देखी जाती है—तब प्रकृति की सीमा लांघी जाती है। तब न भागना शेष रहता है, न संघर्ष। केवल एकत्व।

यही भक्ति का सार है। यही ज्ञान का भी।