फिरत फिरत माया के पीछे, चाहे बोरे राम

फिरत-फिरत माया के पीछे, चाहे बोरे राम ॥
जो अकेला प्रेमभक्ति में डूब जाए वही पाबे राम ॥
न तन अर्जुन न मन चाणक्य न बुद्ध का ध्यान, कैसे तू जानेगा राम ॥
राम तो ज्ञान, उत्तमता, न्यारापन है, जो जानेगा वही पाबेगा मुक्ति ॥