बकरियाँ कटवाती है अपना गला, चाहे कटवाना मेरा भी गला

सब बकरियाँ कटवाती हैं अपना गला,
चाहे कटवाना मेरा भी गला।
कहें, ऐसा ही तो होता है,
ऐसा हमेशा से हुआ आया है।

तुम झुक जाओ मालिक के आगे,
जो वो कहते हैं, कर दो।
देखो, उन्होंने तुम्हें चारा भी तो खिलाया है।

बचपन से उन्होंने चारा हमें खिलाया है,
और बड़ा किया है।
तो जरूर मालिक हमसे बहुत प्यार करते हैं।

हमने बचपन से देखी है चार दीवारी,
अब बाहर जाएँगे कहाँ?
बाहर तो खतरनाक पशु हैं।
हम लड़ेंगे और संघर्ष करेंगे कैसे?
हमें तो शांति और सोना है पसंद।

अगर एक भी बकरी चाहे स्वतंत्रता,
और सारी बकरियाँ बन जाएँगी उसे दुश्मन।
और जाकर कहेंगी अपने मालिक से,
“ये एक बकरी ज्यादा रही उछल,
पहले काटो इसका गला।”