माने क्या?

ब्रह्म माने क्या

ब्रह्म माने क्या?

“ब्रह्म वह है जो सर्वत्र है, पर किसी एक रूप में सीमित नहीं।
जो सबका आधार है, पर स्वयं किसी आधार पर नहीं टिका।”

व्याख्या:
ब्रह्म कोई देवता नहीं है।
कोई आकृति नहीं है।
कोई विशेष स्थान पर रहने वाली सत्ता नहीं है।

जो कुछ भी है —
उसका अस्तित्व जिस पर टिका है,
वही ब्रह्म है।

  • रूप हैं — ब्रह्म निराकार है।
  • नाम हैं — ब्रह्म अनाम है।
  • परिवर्तन हैं — ब्रह्म अपरिवर्तनशील है।

ब्रह्म को देखा नहीं जा सकता,
क्योंकि देखने वाला भी उसी में है।


ब्रह्म की प्रकृति

“ब्रह्म = सत् + चित् + आनन्द”

  • सत् — जो सदा है।
  • चित् — जो स्वयं-प्रकाश चेतना है।
  • आनन्द — जो किसी कारण पर निर्भर नहीं।

ब्रह्म कोई अनुभव नहीं,
बल्कि अनुभव का आधार है।

ब्रह्म बाहर खोजने की वस्तु नहीं,
स्वयं की वास्तविकता है।


आध्यात्मिक अर्थ

जब [[आत्मा]] को सीमित नहीं,
असीम रूप में जाना जाता है —
वही ब्रह्म का बोध है।

जब [[माया]] की सीमाएँ पारदर्शी हो जाती हैं,
जब [[अहंकार]] केंद्र नहीं रहता,

तब ज्ञात होता है —
जो मैं हूँ, वही सर्वत्र है।

ब्रह्म और आत्मा अलग नहीं।
भेद केवल अज्ञान का है।


सार

ब्रह्म दूर नहीं है।
वह अभी है।

जो सबमें है,
जो सबका आधार है,
जो स्वयं कभी बदलता नहीं —

वही ब्रह्म है।