मन माने क्या
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- मन क्या? मन को कैसे शांत करें? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2016) - YouTube.
मन माने क्या?
“मन वह प्रवाह है जिसमें विचार, स्मृति और कल्पना निरंतर उठते-गिरते रहते हैं।”
व्याख्या:
मन कोई ठोस वस्तु नहीं है।
मन = विचारों की धारा।
जहाँ विचार है, वहाँ मन है।
जहाँ विचार नहीं, वहाँ केवल शुद्ध साक्षी है।
मन तीन मुख्य तत्वों से बना है —
- स्मृति (अतीत)
- कल्पना (भविष्य)
- प्रतिक्रिया (वर्तमान की व्याख्या)
मन स्वयं स्वतंत्र सत्ता नहीं है;
वह [[प्रकृति]] का सूक्ष्म आयाम है — निरंतर परिवर्तनशील।
मन की कार्यप्रणाली
“मन = नामकरण + अर्थ-निर्माण + पकड़”
व्याख्या:
- नामकरण – जो दिखा उसे नाम दे दिया।
- अर्थ-निर्माण – उस नाम से कहानी बना ली।
- पकड़ – उसे अपना मान लिया।
उदाहरण:
किसी ने कुछ कहा → मन ने अर्थ बनाया → “यह मेरे खिलाफ है” → प्रतिक्रिया हुई।
वस्तु से अधिक कष्ट, मन की व्याख्या देती है।
मन का स्वभाव है विभाजन करना —
यह अच्छा है / यह बुरा है
यह मैं हूँ / यह दूसरा है
यही विभाजन द्वैत को जन्म देता है।
आध्यात्मिक अर्थ
मन = मनोवैज्ञानिक समय
मन अतीत की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं में जीता है।
वर्तमान क्षण में, जहाँ केवल जागरूकता है — वहाँ मन शांत है।
जब साक्षी मन से तादात्म्य कर लेता है, तब बंधन उत्पन्न होता है।
जब साक्षी मन को देखता है, तब [[समत्व]] प्रकट होता है।
मन शत्रु नहीं है।
लेकिन अनदेखा मन — बंधन है।
देखा हुआ मन — साधन है।
सार
मन विचारों का प्रवाह है,
सत्य नहीं — बल्कि व्याख्या है।
मन को रोकना साधना नहीं है।
मन को समझना ही साधना है।
जहाँ मन शांत है,
वहाँ केवल “मैं हूँ” का मौन प्रकाश शेष रहता है।