माने क्या?

मन माने क्या

मन माने क्या?

“मन वह प्रवाह है जिसमें विचार, स्मृति और कल्पना निरंतर उठते-गिरते रहते हैं।”

व्याख्या:
मन कोई ठोस वस्तु नहीं है।
मन = विचारों की धारा।

जहाँ विचार है, वहाँ मन है।
जहाँ विचार नहीं, वहाँ केवल शुद्ध साक्षी है।

मन तीन मुख्य तत्वों से बना है —

  • स्मृति (अतीत)
  • कल्पना (भविष्य)
  • प्रतिक्रिया (वर्तमान की व्याख्या)

मन स्वयं स्वतंत्र सत्ता नहीं है;
वह [[प्रकृति]] का सूक्ष्म आयाम है — निरंतर परिवर्तनशील।


मन की कार्यप्रणाली

“मन = नामकरण + अर्थ-निर्माण + पकड़”

व्याख्या:

  1. नामकरण – जो दिखा उसे नाम दे दिया।
  2. अर्थ-निर्माण – उस नाम से कहानी बना ली।
  3. पकड़ – उसे अपना मान लिया।

उदाहरण:
किसी ने कुछ कहा → मन ने अर्थ बनाया → “यह मेरे खिलाफ है” → प्रतिक्रिया हुई।

वस्तु से अधिक कष्ट, मन की व्याख्या देती है।

मन का स्वभाव है विभाजन करना —
यह अच्छा है / यह बुरा है
यह मैं हूँ / यह दूसरा है

यही विभाजन द्वैत को जन्म देता है।


आध्यात्मिक अर्थ

मन = मनोवैज्ञानिक समय

मन अतीत की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं में जीता है।
वर्तमान क्षण में, जहाँ केवल जागरूकता है — वहाँ मन शांत है।

जब साक्षी मन से तादात्म्य कर लेता है, तब बंधन उत्पन्न होता है।
जब साक्षी मन को देखता है, तब [[समत्व]] प्रकट होता है।

मन शत्रु नहीं है।
लेकिन अनदेखा मन — बंधन है।
देखा हुआ मन — साधन है।


सार

मन विचारों का प्रवाह है,
सत्य नहीं — बल्कि व्याख्या है।

मन को रोकना साधना नहीं है।
मन को समझना ही साधना है।

जहाँ मन शांत है,
वहाँ केवल “मैं हूँ” का मौन प्रकाश शेष रहता है।