माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।। (शरीर नष्ट हो जाता है, पर मन की इच्छा और माया की चाह आसानी से नहीं मिटती।)
माया महा ठगिनी हम जानी। तिरगुन फाँस लिये कर डोले, बोले मधुरी बानी।। (माया बहुत बड़ी ठग है; तीन गुणों के जाल से सबको बाँध लेती है।)
माया तजि तो क्या भया, मान तजा न जाय। मान बड़े मुनि वर गिले, मान सबै को खाय।। (सिर्फ बाहरी त्याग से कुछ नहीं; जब तक अहंकार नहीं मिटता, माया बनी रहती है।)
माया के निशान
जब लग माया जगत में, तब लग भक्ति न होय। माया छोड़े हरि मिले, कहत कबीर न दोय।। (जब तक माया का मोह है, सच्ची भक्ति नहीं होती।)
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि होत पड़ंत। कहत कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत।। (माया दीपक है और मनुष्य पतंगा; गुरु ज्ञान से ही कोई-कभार इससे बचता है।)
माया से मुक्ति
कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।। (गुरु के बिना माया से निकलने का मार्ग नहीं मिलता।)
माया दोय प्रकार की, जो कोय जाने खाय। एक मिलावे राम से, एक नरक ले जाय।। (माया दो प्रकार की है — एक सत्य की ओर ले जाती है, दूसरी भटका देती है।)
राम नाम कड़वा लगे, मीठा लागे दाम। दुविधा में दोनों गए, माया मिली ना राम।। (जो धन को मीठा और नाम को कड़वा समझता है, वह न संसार पाता है न परमात्मा।)