माने क्या? माया

माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर

माया क्या है

  • माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
    आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।।
    (शरीर नष्ट हो जाता है, पर मन की इच्छा और माया की चाह आसानी से नहीं मिटती।)
  • माया महा ठगिनी हम जानी।
    तिरगुन फाँस लिये कर डोले, बोले मधुरी बानी।।
    (माया बहुत बड़ी ठग है; तीन गुणों के जाल से सबको बाँध लेती है।)
  • माया तजि तो क्या भया, मान तजा न जाय।
    मान बड़े मुनि वर गिले, मान सबै को खाय।।
    (सिर्फ बाहरी त्याग से कुछ नहीं; जब तक अहंकार नहीं मिटता, माया बनी रहती है।)

माया के निशान

  • जब लग माया जगत में, तब लग भक्ति न होय।
    माया छोड़े हरि मिले, कहत कबीर न दोय।।
    (जब तक माया का मोह है, सच्ची भक्ति नहीं होती।)
  • माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि होत पड़ंत।
    कहत कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत।।
    (माया दीपक है और मनुष्य पतंगा; गुरु ज्ञान से ही कोई-कभार इससे बचता है।)

माया से मुक्ति

  • कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
    हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।।
    (गुरु के बिना माया से निकलने का मार्ग नहीं मिलता।)
  • माया दोय प्रकार की, जो कोय जाने खाय।
    एक मिलावे राम से, एक नरक ले जाय।।
    (माया दो प्रकार की है — एक सत्य की ओर ले जाती है, दूसरी भटका देती है।)
  • राम नाम कड़वा लगे, मीठा लागे दाम।
    दुविधा में दोनों गए, माया मिली ना राम।।
    (जो धन को मीठा और नाम को कड़वा समझता है, वह न संसार पाता है न परमात्मा।)
  • [[प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम न चीन्हे कोय]]।