माने क्या?

माया माने क्या

माया माने क्या?

“माया वह है जो बदलती हुई चीज़ को स्थायी दिखाती है,
और अस्थायी को ‘मैं’ से जोड़ देती है।”

व्याख्या:
[[माया]] का अर्थ केवल भ्रम नहीं है।
माया का अर्थ है — गलत पहचान।

जो बदल रहा है,
उसे “मैं” मान लेना — यही माया है।

  • शरीर बदल रहा है।
  • मन बदल रहा है।
  • भावनाएँ बदल रही हैं।

लेकिन इनके साथ तादात्म्य कर लेना —
यही माया का जाल है।

माया वस्तु नहीं है।
यह देखने की भूल है।


माया की कार्यप्रणाली

“माया = नाम + रूप + कहानी”

व्याख्या:

  1. नाम – किसी अनुभव को पहचान दे दी।
  2. रूप – उसे आकार दे दिया।
  3. कहानी – उसके चारों ओर अर्थ गढ़ लिया।

फिर उस कहानी को सच मान लिया।

जगत स्वयं समस्या नहीं है।
समस्या है — उस पर चढ़ी हुई व्याख्या।

माया वास्तविकता को ढँकती नहीं,
बस ध्यान को भटका देती है।


आध्यात्मिक अर्थ

माया = चेतना का स्वयं को भूल जाना।

जब [[चेतना]] स्वयं को शरीर-मन तक सीमित कर लेती है,
तो [[अहंकार]] उत्पन्न होता है।

अहंकार ही माया का केंद्र है।

माया का अंत जगत के नष्ट होने से नहीं,
पहचान के बदलने से होता है।

जब देखने वाला स्वयं को साक्षी रूप में जान लेता है,
तो माया अपना प्रभाव खो देती है।


सार

माया कोई शत्रु नहीं,
न ही कोई अलग शक्ति।

यह केवल अज्ञान की धुंध है।

जैसे ही स्पष्टता आती है —
माया मिटती नहीं,
बस पारदर्शी हो जाती है।

जगत चलता रहता है,
पर भीतर बंधन नहीं रहता।