मुक्ति माने क्या
मुक्ति माने क्या?
“मुक्ति = जो है, उसे वैसा ही रहने देना — और स्वयं को उससे अलग जान लेना।”
व्याख्या: मुक्ति कहीं जाना नहीं है। मुक्ति कोई स्वर्ग प्राप्त करना नहीं है। मुक्ति मृत्यु के बाद की घटना नहीं है।
मुक्ति अभी और यहीं संभव है।
मुक्ति का अर्थ है — गलत पहचान का गिर जाना।
- शरीर है — पर “मैं शरीर हूँ” नहीं।
- मन है — पर “मैं मन हूँ” नहीं।
- विचार हैं — पर “मैं विचार हूँ” नहीं।
यही पहचान का बदलना — मुक्ति है।
मुक्ति की प्रकृति
“मुक्ति = बंधन की असत्यता को देख लेना।”
बंधन वस्तुओं में नहीं है। बंधन पकड़ में है।
जब तक “मुझे यह चाहिए” या “यह ऐसा ही होना चाहिए” — तब तक मन बंधा है।
मुक्ति वस्तु के हटने से नहीं, पकड़ के ढीले पड़ने से होती है।
आध्यात्मिक अर्थ
मुक्ति भविष्य की उपलब्धि नहीं, वर्तमान की स्पष्टता है।
जब [[अहंकार]] स्वयं को केंद्र मानना छोड़ देता है, जब [[माया]] की कहानी पारदर्शी हो जाती है, जब [[आत्मा]] की पहचान स्थिर हो जाती है —
तब मुक्ति घटित नहीं होती, बल्कि स्पष्ट हो जाती है।
मुक्ति में संसार समाप्त नहीं होता। केवल भीतर का संघर्ष समाप्त होता है।
सार
मुक्ति पाने की चीज़ नहीं, पहचान बदलने की घटना है।
जो बदलता है, उसे बदलने दो। जो शाश्वत है, उसमें स्थिर रहो।
बंधन कल्पना है। मुक्ति स्वभाव है।