मोह
मोह जगत का जाल है, मनुज फँसे इस फाँस।
जो जाने मोह का भेद, वही बचे भव‑पाँस॥
मोह माया के फेर में, जीव भटकता फिरे।
ज्ञान दीपक जलाकर, सोई अपना घर पहिचाने॥
परिभाषा
मोह [[अहंकार|अहं]] की [[व्रत्ति]] है — एक भीतरी जन्मजात झुकाव।
अहं कहता है — “मैं”, “मेरा अपना”, “मेरे लोग”, “मेरा परिवार” फिर बुद्धि उसके पक्ष में तर्क गढ़ती है।
लोकधर्म में रूप
- लगाव
- मिठास
- भावनात्मक स्वीकार्यता
सत्य रूप
- Bewitched अवस्था
- अनुभव सच्चा लगता है, वास्तविकता नहीं
- मोह = भ्रम जो मीठा लगता है और चेतना पर कब्ज़ा कर लेता है।
क्यों कठिन है
- जन्मजात
- मीठा दिखता है
- अहंकार से जुड़ा
संबंधित अवधारणाएँ
[[खलक सब रैन का सपना - सत्र 2|कठिन है मोह की धारा, बहा सब जात संसारा]]