ये जो हल्का हल्का सुरूर है, ये तेरी नज़र का कसूर है
ये जो हल्का हल्का सुरूर है
ये तेरी नज़र का कसूर है
के शराब पीना सिखा दिया
तेरे प्यार ने तेरी चाहत ने
तेरी बहकी बहकी निगाह ने
मुझे एक शराबी बना दिया
शराब कैसी खुमार कैसा
ये सब तुम्हारी नवाज़िशें हैं
पिलाई है किस नज़र से तूने
के मुझको अपनी ख़बर नहीं है
साकिया क्या पिला दिया तूने
पीते पीते जला दिया तूने
ना ख़बर अपनी है ना आलम की
मस्त-ओ-बेखुद बना दिया तूने
तेरा प्यार है मेरी ज़िंदगी
ना नमाज़ आती है मुझे ना वुज़ू आता है
सब समझता हूँ तेरी इश्क़ा-गरी ऐ साक़ी
काम करती है नज़र नाम है पैमाने का
AP framework एक खुमारी होती है जो हमे खिचती है । रिश्ते नाते, दुनिया हमे यहाँ रखना चाहती है लेकिन हमे कुछ और खिचता है ।
हल्का हल्का सुरूर = एक खिचाव, अहं है लेकिन उसे होना नहीं है, एन अंदर की बैचैनी मिटाने खुमार है शराब पीना = प्रेम रस