AVALOKAN शून्यता सप्तति

शून्यता सप्तति छंद 32 — संस्कृत और असंस्कृत दोनों ही अहंकार के विस्तार हैं

सप्तति छंद 32

“संस्कृत (निर्मित) और असंस्कृत (अनिर्मित) न एक हैं, न अनेक। वे न भाव-रूप हैं, न अभाव-रूप और न ही भावाभाव-रूप। समस्त विषयों को इसी प्रकार समझना चाहिए।”

संस्कृत और असंस्कृत का भ्रम

विषय → पहचान → अहं→ विस्तार → बन्धन

यह सूत्र केवल दार्शनिक कथन नहीं है; यह [[अहंकार|अहं]] की पूरी संरचना को देखने का निमंत्रण है।

संस्कृत का अर्थ है—जो बनाया गया है, जो संयोजित है, जो कारणों पर आधारित है, जो उत्पन्न हुआ है। समस्त भौतिक विषय, अनुभव, संबंध, उपलब्धियाँ, प्रतिष्ठा, सुख, सुविधा—ये सभी संस्कृत हैं। ये निर्मित हैं, इसलिए परिवर्तनशील हैं।

असंस्कृत का सामान्य अर्थ लिया जाता है—जो निर्मित नहीं है, जो मूल है, जो प्रथम है, जो सत्य है, जो किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुआ। साधारण धार्मिक मन इसी शब्द को पकड़कर तुरंत किसी ‘उच्चतर वस्तु’ की कल्पना कर लेता है।

यहीं सबसे सूक्ष्म भ्रम आरम्भ होता है।

अहंकार संस्कृत विषयों से थककर असंस्कृत की ओर भागता है। पहले उसे धन चाहिए था, फिर सम्मान; फिर वह कहता है—नहीं, यह सब व्यर्थ है, अब मुझे शांति चाहिए, मौन चाहिए, सत्य चाहिए, मुक्ति चाहिए।

वस्तु बदल गई, संरचना नहीं।

पहले वह भोग का अहंकार था, अब वह त्याग का अहंकार है। पहले वह संसार में श्रेष्ठ होना चाहता था, अब आध्यात्मिकता में विशेष होना चाहता है।

अहंकार विषय बदलता है, स्वयं को नहीं।

यही छंद का केंद्र है।

अहंकार की भूख और विषयों का सहारा

अहंकार → विषय पर आश्रय → पहचान → निरंतरता

[[अहंकार|अहं]] बिना विषय के जीवित नहीं रह सकता। उसका अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है; वह निरंतर किसी न किसी पहचान पर टिका रहता है।

मैं कौन हूँ?

यदि भीतर से यह प्रश्न उठे, तो अधिकांश उत्तर विषयों से आते हैं—

मैं सफल हूँ।
मैं असफल हूँ।
मैं ज्ञानी हूँ।
मैं भक्त हूँ।
मैं त्यागी हूँ।
मैं पीड़ित हूँ।
मैं साधक हूँ।

इनमें से कोई भी उत्तर आत्मा का नहीं, अहंकार का है।

अहंकार स्वयं को प्रत्यक्ष नहीं दिखा सकता; उसे किसी विषय का सहारा चाहिए। वह वस्तु, व्यक्ति, विचार, उपलब्धि, पीड़ा—कुछ भी पकड़ लेता है।

संस्कृत विषयों में यह स्पष्ट दिखता है। धन, संबंध, प्रतिष्ठा, सुख—इनसे पहचान बनती है। व्यक्ति कहता है—“मैं ठीक हूँ, बस मुझे इन चीज़ों की लत पड़ गई है।” वह मानता है कि दोष विषयों में है, स्वयं में नहीं।

फिर वह निष्कर्ष निकालता है—संस्कृत विषय ही समस्या हैं।

अब वह असंस्कृत विषयों की ओर भागता है।

वह सोचता है—यदि संसार छोड़ दूँ, यदि मौन पकड़ लूँ, यदि ‘सत्य’ को पकड़ लूँ, यदि ‘शून्यता’ को समझ लूँ—तो तृप्ति मिल जाएगी।

परन्तु यहाँ भी वही संरचना सक्रिय है।

अब “मेरा धन” की जगह “मेरा ज्ञान” आ गया।
“मेरी उपलब्धि” की जगह “मेरी अनुभूति” आ गई।

यह मुक्ति नहीं, केवल विषय का परिष्कृत रूप है।

असंस्कृत भी अहंकार की रचना बन सकता है

भौतिक आसक्ति → विरक्ति → आध्यात्मिक पहचान → सूक्ष्म बन्धन

मनुष्य प्रायः मानता है कि असंस्कृत किसी परम सत्य की वस्तु है—एक ऐसी स्थिति जिसे पकड़ लिया जाए। परंतु जो भी “मैंने पाया” के रूप में उपस्थित हो, वह पहले ही अहंकार के क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है।

अहंकार कहता है—

मैंने सत्य जान लिया।
मैं अब सामान्य लोगों जैसा नहीं हूँ।
मैं अब आध्यात्मिक हूँ।
मैं अब जानता हूँ कि संसार मिथ्या है।

यहीं सबसे खतरनाक स्थिति उत्पन्न होती है।

क्योंकि भौतिक अहंकार को व्यक्ति पहचान सकता है, पर आध्यात्मिक अहंकार स्वयं को ज्ञानी समझकर छिप जाता है।

इसलिए कहा गया—असंस्कृत भी संस्कृत है, यदि वह अहंकार की पकड़ में है।

अहंकार ने स्वयं को धोखा देने के लिए उसे नया नाम दे दिया है। उसने अपनी ही रचना को “मौलिक”, “प्रथम”, “सत्य” कह दिया।

पर नाम बदलने से संरचना नहीं बदलती।

यदि “सत्य” भी मेरे लिए उपलब्धि बन गया, तो वह सत्य नहीं रहा—वह केवल परिष्कृत अहंकार है।

“सोना” और सत्य की समस्या

शब्द → मानसिक छवि → निजी अर्थ → ‘मेरा सत्य’

जब आप “सोना” शब्द बोलते हैं, तो हर व्यक्ति के भीतर अलग छवि उठती है।

किसी को चूड़ियाँ याद आती हैं।
किसी को गहने।
किसी को गोल्ड बार।
किसी को निवेश।

शब्द एक है, मानसिक संरचना अनेक है।

इसीलिए सत्य के बारे में बहुत सावधानी रखी जाती है। क्योंकि जैसे ही आप सत्य को शब्द में बाँधते हैं, अहंकार उसे निजी संपत्ति बना लेता है।

वह कहता है—“यह मेरा सत्य है।”

यहीं समस्या है।

सत्य को जानना और सत्य को मानसिक वस्तु बना लेना—दोनों भिन्न हैं।

अहंकार सत्य को भी संग्रह बना लेता है। वह उसे अनुभव, निष्कर्ष, मत, दर्शन, पहचान में बदल देता है।

फिर सत्य नहीं बचता; केवल ‘मेरी समझ’ बचती है।

इसलिए धर्मग्रंथ संकेत करते हैं, पर पकड़ने योग्य वस्तु नहीं देते।

वे दिशा देते हैं, निष्कर्ष नहीं।

न एक हैं, न अनेक

एक ↔ अनेक
दोनों → विचार की श्रेणियाँ → अहं के लिए

छंद कहता है—संस्कृत और असंस्कृत न एक हैं, न अनेक।

यह कथन साधारण तर्क से विरोधाभासी लगता है। यदि दो चीज़ें हैं, तो या तो वे एक होंगी या अनेक। फिर “न एक, न अनेक” कैसे?

क्योंकि “एक” और “अनेक” दोनों ही विचार की श्रेणियाँ हैं, और विचार अहंकार के क्षेत्र में कार्य करता है।

अहंकार तुलना से जीता है।
वह विभाजन चाहता है।
वह संख्या चाहता है।

एक भी उसकी श्रेणी है, अनेक भी उसकी श्रेणी है।

जब हम कहते हैं—“सब एक है”, तब भी बोलने वाला कौन है? यदि बोलने वाला अहंकार है, तो “एकत्व” भी उसकी नई उपलब्धि बन जाती है।

जब हम कहते हैं—“बहुत प्रकार की वास्तविकताएँ हैं”, तब भी वही विभाजन सक्रिय है।

इसलिए यह कथन संख्या का निषेध नहीं, अहंकार की संरचना का निषेध है।

जहाँ सत्य है, वहाँ गणना नहीं।

एक और अनेक दोनों अनुभव की श्रेणियाँ हैं; सत्य उनका विषय नहीं।

न भाव-रूप, न अभाव-रूप

‘है’ → द्वैत
‘नहीं है’ → द्वैत
दोनों → जानने वाला + ज्ञेय

छंद आगे कहता है—वे न भाव-रूप हैं, न अभाव-रूप, न ही भावाभाव-रूप।

भाव का अर्थ—कुछ है।
अभाव का अर्थ—कुछ नहीं है।

हमारा मन इन दो ध्रुवों में सोचता है। या तो कोई वस्तु है, या नहीं है।

पर दोनों स्थितियों में द्वैत बना रहता है।

यदि मैं कहता हूँ—“कुछ है”, तो तुरंत जानने वाला और ज्ञेय उपस्थित हो जाते हैं। मैं और वह।

यदि मैं कहता हूँ—“कुछ नहीं है”, तब भी वही संरचना रहती है। अब मैं उस ‘न होने’ को जान रहा हूँ।

इसलिए “है” और “नहीं है”—दोनों विचार के क्षेत्र में हैं।

दोनों [[अहंकार|अहं]] के लिए हैं।

यही कारण है कि केवल “शून्य” कहना भी पर्याप्त नहीं। यदि शून्यता भी विचार की वस्तु बन गई, तो वह फिर अहंकार का आभूषण बन जाएगी।

इसलिए कहा जा सकता है—अहंकार मिथ्या है।

पर यहाँ भी सावधानी चाहिए।

अहंकार तुरंत कहेगा—“हाँ, अहंकार मिथ्या है। अब मैं ज्ञानी अहंकार हूँ।”

वह अपनी मृत्यु के सिद्धांत को भी अपनी नई पहचान बना लेता है।

यह उसकी अद्भुत चालाकी है।

धर्मग्रंथ का वास्तविक विषय

जहाँ अहं दिखे → वहाँ जाँच
जहाँ केवल सिद्धांत हो → वहाँ सावधानी

हर चीज़ में अहंकार को देखो।

जहाँ अहंकार की बात नहीं हो रही, वहाँ धर्मग्रंथ का सार नहीं पकड़ा गया।

धर्मग्रंथ ब्रह्मांड-विज्ञान की पुस्तकें नहीं हैं। वे अहंकार की संरचना को देखने की विधि हैं।

यदि कोई शास्त्र पढ़कर केवल सिद्धांत बढ़ रहे हैं, पर स्वयं की पकड़ नहीं दिख रही—तो पढ़ना भी अहंकार की खुराक बन गया।

ज्ञान भी भोजन बन सकता है।
भक्ति भी भोजन बन सकती है।
वैराग्य भी भोजन बन सकता है।
मौन भी भोजन बन सकता है।

यहाँ प्रश्न विषय का नहीं, उपयोगकर्ता का है।

कौन पकड़ रहा है?

यदि पकड़ने वाला [[अहंकार|अहं]] है, तो पवित्रतम वस्तु भी बन्धन बन जाएगी।

“समस्त विषयों को इसी प्रकार समझना चाहिए”

कोई विषय अलग नहीं
हर विषय → अहंकार के लिए संभावित खुराक

यह अंतिम वाक्य सबसे निर्णायक है—

“समस्त विषयों को इसी प्रकार समझना चाहिए।”

अर्थात् किसी विषय को विशेष छूट मत दो। यह मत कहो कि संसार के विषय बुरे हैं, पर आध्यात्मिक विषय अलग हैं।

नहीं।

सारे विषयों को इसी दृष्टि से देखो।

धन भी पकड़ हो सकता है।
ज्ञान भी पकड़ हो सकता है।
भक्ति भी पकड़ हो सकती है।
शून्यता भी पकड़ हो सकती है।

असंस्कृत भी संस्कृत है, यदि उसे अहंकार ने नाम देकर अपना विस्तार बना लिया।

यही गहरी बात है।

अहंकार स्वयं को समाप्त नहीं करना चाहता; वह केवल अपने रूप बदलता है।

वह संसार से धर्म में प्रवेश कर सकता है।
वह भोग से तप में प्रवेश कर सकता है।
वह अज्ञान से ज्ञान-अभिमान में प्रवेश कर सकता है।

यदि यह देखा नहीं गया, तो साधना केवल परिष्कृत बंधन बन जाती है।

अंतिम स्पष्टता

संस्कृत = निर्मित = विषय = पकड़

असंस्कृत = जिसे अहंकार ‘मौलिक’ कहता है = सूक्ष्म पकड़

संस्कृत → भोग
असंस्कृत → आध्यात्मिक अभिमान

दोनों → अहं का विस्तार → बन्धन

जहाँ ‘मेरा’ है, वहाँ सत्य नहीं
जहाँ अहं है, वहाँ द्वैत है
जहाँ द्वैत है, वहाँ नशा है
भ्रम वास्तविकता
समस्या विषयों में है समस्या पहचान में है
संस्कृत बुरे, असंस्कृत अच्छे दोनों अहंकार के साधन बन सकते हैं
ज्ञान मुक्ति देगा ज्ञान भी अहंकार की खुराक बन सकता है
“अहंकार मिथ्या है” जानना पर्याप्त है जानने वाले की संरचना देखना आवश्यक है

मुक्ति विषय-परिवर्तन नहीं है।

मुक्ति यह देखना है कि विषय चाहे कोई भी हो—भौतिक, सूक्ष्म, आध्यात्मिक, दार्शनिक—यदि उसके केंद्र में “मैं” अपनी निरंतरता खोज रहा है, तो बन्धन अभी समाप्त नहीं हुआ।

इसलिए संस्कृत और असंस्कृत का प्रश्न वस्तुओं का नहीं, दृष्टि का प्रश्न है।

जहाँ “मेरा” है, वहाँ पकड़ है।
जहाँ पकड़ है, वहाँ [[अहंकार|अहं]] है।
जहाँ अहं है, वहाँ द्वैत है।
जहाँ द्वैत है, वहाँ सत्य अनुपस्थित है।

सत्य किसी उपलब्धि का नाम नहीं।

वह वहाँ प्रकट होता है जहाँ पकड़ समाप्त होती है।

और पकड़ समाप्त होती है तब, जब हर विषय में—विशेषतः सबसे पवित्र दिखने वाले विषयों में भी—अहंकार की सूक्ष्म गति देख ली जाती है।

यही शून्यता की शिक्षा है।
और यही वास्तविक वैराग्य।