AVALOKAN श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता 7.1, 7.2 — अहं, विज्ञान और पूर्णज्ञान

7.01: हे पार्थ! ‘मैं’ को मुझमें स्थित करते हुए, मेरा ही आश्रय लेते हुए, योग में संलग्न रहते हुए, मुझे बिना किसी संशय के संपूर्ण रूप से किस प्रकार तुम जानोगे—वह सुनो।

7.02: मैं तुम्हारे लिए इस ज्ञान को विज्ञान सहित, पूर्ण रूप से कहूँगा; जिसे जानने से इस संसार में फिर अन्य कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।

ज्ञान और विज्ञान की प्रस्तावना: जानना क्या है?

‘मैं’ → आश्रय → योग → समग्र ज्ञान

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय के आरम्भ में एक अत्यंत सूक्ष्म घोषणा की जाती है। कहा जाता है— “‘मैं’ को मुझमें स्थित करते हुए, मेरा ही आश्रय लेते हुए, योग में संलग्न रहकर, तुम मुझे असंशय और समग्र रूप से जानोगे—वह सुनो।” यहाँ साधारण उपदेश नहीं है; यहाँ जानने की पूरी प्रक्रिया का मानचित्र दिया जा रहा है।

दूसरे ही श्लोक में बात और स्पष्ट होती है— “मैं तुम्हें ज्ञान को विज्ञान सहित पूर्ण रूप से कहूँगा; जिसे जान लेने पर इस संसार में फिर कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।” यह कथन अतिशयोक्ति नहीं है। यह उस बिंदु की ओर संकेत है जहाँ जानना अपनी चरम सीमा पर पहुँचकर समाप्त हो जाता है।

यहाँ दो शब्द केंद्रीय हैं—[[ज्ञान]] और [[विज्ञान]]। सामान्यतः इन्हें समानार्थी समझ लिया जाता है, परंतु यहाँ दोनों में निर्णायक भेद है।

लोकधर्म की समझ शास्त्रीय अर्थ
गाड़ी कैसे चलती है — ज्ञान गाड़ी से मेरा संबंध क्या है — विज्ञान
वस्तु का उपयोग — ज्ञान वस्तु का सत्य — विज्ञान
बाहरी सूचना अंतरतम बोध

संपू को जानना ज्ञान है। टकले को जान लेना विज्ञान है। यदि बाल नहीं उग रहे, तो क्रीम बदलते रहना ज्ञान का खेल है; पर यह समझ लेना कि “मैं टकला हूँ”—यह विज्ञान है। यही विशिष्ट ज्ञान है, जो भ्रम की जड़ पर प्रहार करता है।


भिन्नता का भ्रम और एकत्व का अतिक्रमण

रूप भिन्न → तत्व एक
भेद दिखाई देता है → आधार एक

दो वस्तुएँ रंग, आकार, उपयोग में भिन्न दिख सकती हैं। पर यदि दोनों मिट्टी से बनी हैं, तो तत्वतः दोनों एक हैं। भिन्नता सतह पर है; एकत्व आधार में है।

परंतु यहाँ सावधानी आवश्यक है। [[अद्वैत]] का अर्थ केवल “एक” नहीं है। अद्वैत का अर्थ है—“दो नहीं”। यदि दो नहीं, तो “एक” भी नहीं, क्योंकि “एक” भी “दो” के संदर्भ में ही अर्थ पाता है। अद्वैत संख्या का सिद्धांत नहीं, भेद के निरसन का संकेत है।

हम शुरुआत तीन से करते हैं—

आप | दुनिया | सत्य
अहं | प्रकृति | आत्मा

धीरे-धीरे पता चलता है कि [[अहंकार]] और प्रकृति जिस रूप में दिख रहे थे, वे स्थायी सत्य नहीं हैं। वे [[माया]] की संरचनाएँ हैं। जब अहं हटता है, तब जो शेष रहता है वही [[सनातन]] है।

यहाँ “मिलन” शब्द भ्रामक हो सकता है। बात मिलने की नहीं, बल्कि गलने की है। “मैं मैं से मिले”—इसका अर्थ है “मैं हट जाए।” जब दर्पण सामने लाया जाता है और प्रतिबिंब मिट जाता है—वह योग है। दो का एक होना योग नहीं है; दो का समाप्त होना योग है।


योग: जुड़ना नहीं, मिटना

विषय से जुड़ना → कामना
स्व से गलना → योग

सामान्य समझ में योग का अर्थ है—जुड़ना। परंतु यहाँ स्पष्ट किया गया है कि विषयों से जुड़ना योग नहीं है; वह [[कामना]] है। विषयों से मिलन वासना है। [[आत्मा]] से मिलन का अर्थ है—अहं का विलय।

“बात मिलने की नहीं, बल्कि गलने की हो रही है।”

[[आत्मज्ञान]] के बिना अहं नहीं मिटता। और अहं मिटे बिना जो भी कर्म होगा, उसमें कहानी जुड़ जाएगी। अहं कर्म करता है, फिर उसके चारों ओर कथा रचता है—“मैंने किया, मेरे कारण हुआ।” बिना कथा का कर्म ही [[निष्काम कर्म]] है।

अहंकारी कर्म निष्काम कर्म
कर्तापन की भावना साक्षीभाव
फल की अपेक्षा कर्तव्य की सहजता
कहानी निर्माण शांत पूर्णता

अहं को भ्रम है कि उसके बिना ब्रह्मांड बिखर जाएगा। वह कहता है—“मैं जरूरी हूँ।” यही उसकी मूल असुरक्षा है।


ज्ञान, विज्ञान और लोकधर्म की विकृति

ज्ञान → सूचना
विज्ञान → आत्मबोध

लोकधर्म ने ज्ञान और विज्ञान दोनों को बाहरी शब्द बना दिया। पश्चिम में जिसे science कहा जाता है, वह यहाँ बताए गए विज्ञान के समकक्ष नहीं है। यहाँ विज्ञान का अर्थ है—स्व का विशिष्ट ज्ञान।

लोकधर्म शास्त्र
विज्ञान = तकनीकी दक्षता विज्ञान = आत्मज्ञान
बाहरी निर्माण आंतरिक उद्घाटन

इसलिए कहा गया—ज्ञान और विज्ञान साथ हो जाएँ, तो फिर कुछ जानने योग्य शेष नहीं रहता। यह पूर्णज्ञान है। इसमें [[विद्या]] और [[अविद्या]] दोनों का स्थान है, पर विद्या शीर्ष पर है। विद्या दिशा देती है कि अविद्या का उपयोग कहाँ तक उचित है।

आत्मज्ञानी संसार को सहजता से जान सकता है। पर संसारी व्यक्ति आत्मज्ञान तक नहीं पहुँच पाता, क्योंकि उसकी प्राथमिकता उलटी है।


निष्कर्ष: मिटने का साहस

भ्रम → अहं → मिटना → आत्मज्ञान → निष्काम कर्म → पूर्णज्ञान

योग जुड़ने का नहीं, मिटने का साहस है। विषयों से जुड़कर चैन नहीं मिलेगा; अग्नि में कूदकर गलने से मिलेगा। [[प्रेम]] भी यही है—न्यौछावर होने की तैयारी।

जब ज्ञान और विज्ञान साथ आते हैं, तब जानना समाप्त होता है। तब संसार विरोधी नहीं रहता; पर केंद्र बदल जाता है। तब कर्म होते हैं, पर कर्ता नहीं रहता। तब प्रश्न आते हैं, पर उनसे भागना नहीं होता।

अंततः जो शेष रहता है, वही [[सनातन]] है—न परिभाषित, न सीमित, न द्वैत में बँधा।

और यही वह बिंदु है जहाँ जानना पूर्ण होकर शांत हो जाता है।

  • वस्तु और [[आत्मा]] के बीच भिन्नता केवल प्रतीति है।
  • [[अहंकार]] और [[प्रकृति]] भ्रम हैं; अद्वैत केवल “दो नहीं” है।
  • योग का वास्तविक लक्ष्य मिटना है, न कि केवल मिलने की आकांक्षा।
  • ज्ञान और विज्ञान का वास्तविक स्वरूप आत्मज्ञान में है।
  • कर्म का सर्वोत्तम रूप निष्काम कर्म है।
  • विध्या और अविध्या का सही संतुलन जीवन में स्थायित्व लाता है।

प्रश्नोत्तर (सत्र के बाद)

प्रश्न 1: क्या सचमुच “कुछ करना” आवश्यक है, या यह केवल अहं की बेचैनी है?

जब हम कहते हैं — “अच्छी दुनिया बनानी है”, “कुछ करना है”, “समाज बदलना है” — तो पहली जाँच यह होनी चाहिए कि यह आग्रह कहाँ से उठ रहा है। यदि भीतर अशांति है, तो बाहर की सक्रियता अक्सर उसी अशांति का विस्तार बन जाती है।

स्वास्थ्य, समाज, पर्यावरण — जहाँ भी समस्या दिखती है, वहाँ तुरंत हस्तक्षेप करने की इच्छा उठती है। पर क्या यह स्पष्ट है कि हम वास्तव में क्या बदल सकते हैं और क्या नहीं? कई बार अहं वह काम करने निकल पड़ता है जो उसके सामर्थ्य में नहीं है, और फिर असफलता का दोष परिस्थिति पर डाल देता है।

“कुछ करना है” — यह वाक्य बहुत आकर्षक है, परंतु अक्सर अस्पष्ट होता है। यदि यह स्पष्ट न हो कि क्यों, किसलिए और किस केंद्र से, तो यह केवल मानसिक उत्तेजना बन जाता है।

स्व का अर्थ बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि [[अहंकार]] का क्षय है। बाहर क्या होगा, इसे करने से कोई रोक नहीं रहा। परंतु यदि भीतर परिवर्तन नहीं हुआ, तो हर कर्म में कहानी जुड़ जाएगी — “मैंने किया”, “मेरे कारण हुआ”, “मुझे श्रेय मिलना चाहिए।” यही कथा-बुनाई संघर्ष की जड़ है।

आज का अधिकांश सक्रियतावाद इसी मानसिक संरचना पर खड़ा है — “साथी हाथ बढ़ाना।” पर पृथ्वी ने स्वयं कभी नहीं कहा कि “युवाओ, कुछ करके दिखाओ।” इतिहास में जिन लोगों ने पृथ्वी को बिगाड़ा, वे भी यही मानकर चले थे कि वे सही हैं और कुछ आवश्यक कर रहे हैं।

यहाँ प्रश्न उठता है — “क्या हम चुप बैठे रहें?”
पहला उत्तर यह है कि क्या हमारे भीतर चुप रहने की क्षमता है? हम चाहते हैं कि भीतर कुछ न बदले, पर बाहर क्रांति हो जाए। यह असंभव है।

क्रांति और [[अहंकार]] का मिटना अलग-अलग प्रक्रियाएँ नहीं हैं। यदि भीतर निर्मलता आती है, तो बाहर की समझ स्वतः बदलती है। अन्यथा, एक अहंकारी क्रांतिकारी समाज के लिए और बड़ी समस्या बन सकता है।


प्रश्न 2: क्या प्रश्न ठहरता नहीं, या हम उससे भाग जाते हैं?

अक्सर कहा जाता है — “प्रश्न टिकता नहीं।”
पर वस्तुतः प्रश्न वहीं रहता है; हम उससे हट जाते हैं।

जब कोई उत्तर हमें असुविधाजनक लगता है, हम उसे “मूर्खतापूर्ण” कहकर आगे बढ़ जाते हैं। पर क्या हमने उसे पर्याप्त ईमानदारी से देखा? यदि जीवन में बार-बार उलझन है, तो यह संभावना क्यों न स्वीकारें कि हमारी मूल धारणाएँ ही त्रुटिपूर्ण हो सकती हैं?

People of the Lie में एक गहरी बात कही गई है — मनुष्य अपनी मौलिक भूल को स्वीकारने से बचता है। जहाँ हमें सबसे अधिक भरोसा होता है, वहीं से हम धोखा खाते हैं। और सबसे अधिक भरोसा हमें स्वयं पर होता है।

यदि किसी बच्चे की रक्षा करने वाली ही उसकी हानि का कारण बन जाए, तो वह कैसे बचेगा? इसी प्रकार, यदि हमारी अपनी मान्यताएँ ही हमारी पीड़ा की जड़ हों, और हम उन्हें प्रश्नों से बचाते रहें, तो परिवर्तन असंभव है।

प्रश्न से भागना आत्मरक्षा है। प्रश्न के साथ ठहरना आत्मपरिवर्तन।


प्रश्न 3: क्या जीवन का नया अध्याय सचमुच अलग लिखा जा सकता है?

यदि किसी ने जीवन के बीस अध्याय एक ही ढाँचे में जिए हैं, तो इक्कीसवाँ अध्याय अपने आप अलग नहीं हो जाएगा। यह अपेक्षा कि “अब से सब बदल जाएगा” — प्रायः केवल इच्छा है, संरचनात्मक परिवर्तन नहीं।

कहावत है — “Those who live by the sword, die by the sword.”
इसी प्रकार, जो लोकधर्म की धारणाओं के अनुसार जीते हैं, वे उसी के परिणाम भुगतते हैं।

कहानी में उतर जाना आसान है; उससे बाहर निकलना कठिन। यदि भीतर वही पहचान, वही प्रतिक्रियाएँ, वही असुरक्षाएँ बनी रहें, तो बाहरी परिस्थिति बदलने से जीवन का ढाँचा नहीं बदलता।

परिवर्तन अध्याय बदलने से नहीं, लेखक बदलने से होता है — और लेखक है हमारा आंतरिक केंद्र।


प्रश्न 4: भोलापन क्या है? क्या यह मूर्खता है?

भोलापन मूर्खता नहीं है।
यह कुटिलता का अभाव है।

चतुराई वह है जहाँ हम जानते हैं कि सीधा मार्ग क्या है, पर लाभ के लिए टेढ़ा मार्ग चुनते हैं। भोलापन वह है जहाँ जो जैसा है, उसे वैसा देख लिया जाए — और वैसा ही जिया जाए।

[[अहंकार]] देख तो लेता है, पर जीता नहीं; वह कहानी जोड़ देता है। भोलापन कहानी का त्याग है।

आनंद स्वभाव है। मुक्ति स्वभाव है। उसी प्रकार भोलापन भी स्वभाव है। हम इसे लेकर पैदा होते हैं। बाद में हमें सिखाया जाता है — “भोले रहोगे तो पीड़ जाओगे”, “जीवन में आगे बढ़ने के लिए टेढ़ा होना पड़ता है।”

लोकधर्म सरलता को विकृत कर देता है। परिणाम यह होता है कि बच्चा भी धीरे-धीरे चालाक बनना सीख जाता है।

भोलापन चालाकी
स्पष्टता कपट
समत्व दुविधा
आंतरिक संतोष सदैव असुरक्षा

किसी को प्रेम करना हो तो उसे उसकी निष्कवच अवस्था में देखो — जैसे वह सो रहा हो।
किसी का उपयोग करना हो तो उसे भोग की वस्तु की तरह देखो। अंतर स्पष्ट हो जाएगा।

सच्चा भोला वह है जो चालाकी को समझता है, पर उसे अपनाता नहीं। “मैं तुम्हें ठग सकता हूँ, पर करूँगा नहीं” — यही आंतरिक विजय है। सबको ठग लेने पर भी व्यक्ति दुविधा में रहता है; पर किसी को न ठगने वाला भीतर से तृप्त रहता है।

[[आत्मा]] स्वभाव है, और शिव उसी स्वभाव का प्रतीक। इसलिए कहा गया — “सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्।”
कृष्ण, शिव, बुद्ध, महावीर — इन सबका भोलापन मूर्खता नहीं, बल्कि परिपक्व सरलता है।

टेढ़े होने को विशेषता मत मानो। सबसे बड़ा मूर्ख वह है जो अपनी चालाकी पर गर्व करता है। जो तुम टेढ़े होकर नहीं पा सकते, वह सीधा होकर पाया जा सकता है।

समझदारी पूर्ण हो सकती है, पर हृदय फिर भी भोला रह सकता है। यही संतुलन परिपक्वता है।