संघर्ष कैसे करूँ

करना था एक वक़्त पर संघर्ष, सोचा था बदल दूँगा दुनिया।
जब देखी दुनिया की असलियत, तब जाना —
बकरियाँ बकरियों की तरह ही जीना चाहती हैं।

अब संघर्ष कैसे करूँ, जब सपना ही टूट चुका है?
क्यों जाऊँ किसी बकरी के पास उसे समझाने,
जब उसे लगता है कि चारा खिलाने वाला ही उसका दोस्त है?

लोग सोए हैं — पर अपनी जान पर खेलकर उन्हें जगाना क्यों?

यह माया है या लीला, अब समझ नहीं आता।
अब जीना है — कुछ बदलने के लिए नहीं,
बल्कि प्रेम और सत्य के लिए।