संसार
कबीर यहु जग अंधला, जैसी अंधी गाइ।
बछा था सो मरि गया, ऊभी चांम चटाइ॥
कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय।
यह पुर पट्टन यह गली, बहुरि न देखौ आय॥ ~ संत कबीर
परिभाषा
संसार भ्रमित “मैं” की दृष्टि है।
लक्षण
- उल्टा-पुल्टा दिखना
- कल्पनाएँ आरोपित होना
- अनुभव सच्चा लगता है
मुख्य सूत्र
भ्रमित मैं → भ्रमित संसार
संबंधित अवधारणाएँ
[[खलक सब रैन का सपना सत्र 2 — कठिन है मोह की धारा, बहा सब जात संसारा|कठिन है मोह की धारा, बहा सब जात संसारा]]