संसार

कबीर यहु जग अंधला, जैसी अंधी गाइ।
बछा था सो मरि गया, ऊभी चांम चटाइ॥

कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय।
यह पुर पट्टन यह गली, बहुरि न देखौ आय॥ ~ संत कबीर

परिभाषा
संसार भ्रमित “मैं” की दृष्टि है।

लक्षण

  • उल्टा-पुल्टा दिखना
  • कल्पनाएँ आरोपित होना
  • अनुभव सच्चा लगता है

मुख्य सूत्र
भ्रमित मैं → भ्रमित संसार

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