सत्य माने क्या
सत्य माने क्या?
“सत्य वह है जो तीनों कालों में अपरिवर्तित रहे —
जो कभी बदलता नहीं, कभी टूटता नहीं, कभी समाप्त नहीं होता।”
व्याख्या:
जो बदलता है, वह तथ्य हो सकता है —
पर सत्य नहीं।
- शरीर बदलता है।
- मन बदलता है।
- विचार बदलते हैं।
- अनुभव बदलते हैं।
जो परिवर्तन के अधीन है,
वह सापेक्ष है।
सत्य सापेक्ष नहीं होता।
वह किसी दृष्टिकोण पर निर्भर नहीं होता।
सत्य को मानने की ज़रूरत नहीं —
वह पहले से है।
सत्य की प्रकृति
“सत्य = जो है, जैसा है, वैसा ही है।”
सत्य को सजाना नहीं पड़ता।
उसे सिद्ध नहीं करना पड़ता।
असत्य को प्रमाण चाहिए।
सत्य स्वयं-प्रकाश है।
जैसे प्रकाश को दिखाने के लिए किसी और प्रकाश की ज़रूरत नहीं,
वैसे ही सत्य को सिद्ध करने के लिए किसी तर्क की आवश्यकता नहीं।
सत्य विचार से परे है,
क्योंकि विचार स्वयं परिवर्तनशील है।
आध्यात्मिक अर्थ
सत्य वस्तु नहीं है,
अवस्था भी नहीं है।
सत्य वही है —
जो [[आत्मा]] है।
जो [[चेतना]] है।
जब [[अहंकार]] की पहचान गिरती है,
तब सत्य छिपा नहीं रहता।
सत्य को पाना नहीं है —
केवल असत्य को देखना है।
असत्य गिरता है,
सत्य शेष रहता है।
सार
सत्य नया नहीं होता।
वह खोज से उत्पन्न नहीं होता।
वह सदा था, सदा है, सदा रहेगा।
जो आता-जाता है — वह सत्य नहीं।
जो कभी न जाए — वही सत्य है।