AVALOKAN BASIC WISDOM , माने क्या?

सनातन धर्म क्या है? — मन को प्रकृति के पार ले जाना

प्रारम्भिक आधार : मन और प्रकृति

प्रकृति = परिवर्तनशील
      ↓
गुण, समय, विचार, आकार, स्थान
      ↓
मन = इन्हीं में उलझा हुआ

प्रकृति का अर्थ है — जो बदलता है।
गुण बदलते हैं, विचार बदलते हैं, आकार बदलते हैं, स्थान बदलता है, समय चलता है।

मन इन्हीं परिवर्तनों में जीता है।
मन निरंतर तुलना, कल्पना, स्मृति, आकांक्षा, पहचान और प्रतिक्रिया में उलझा रहता है।

इसलिए कहा जा सकता है:

प्रकृति = परिवर्तनशील
मन = परिवर्तन में उलझा हुआ

यहीं से अशांति उत्पन्न होती है। क्योंकि जो बदलता है, उसमें स्थिरता नहीं मिल सकती।

सनातन और धर्म की स्पष्ट परिभाषा

काल (समय)
     ↓
प्रकृति (जन्म–परिवर्तन–मरण)
     ↓
मन (विचार–भाव–अहं)
     ↓
प्रश्न : क्या कुछ अकाल भी है?
     ↓
आत्मा (अजात, अचल, अकाल)

जो काल की सीमा से बाहर है, वही सनातन है।
जो समय में आता है, बदलता है, और समाप्त होता है—वह सनातन नहीं हो सकता।

हमारे मन में जो कुछ भी है—विचार, स्मृति, भावना, कल्पना—सब समय की ही उपज है। हम दुनिया में जो कुछ देखते हैं—रूप, आकार, परंपरा, संस्कृति, संबंध—वे भी समय में ही उत्पन्न होते हैं और समय में ही समाप्त हो जाते हैं। इसीलिए कहा गया कि मन, जगत, रूप, भावना, परंपरा—इनमें से कोई भी सनातन नहीं है। ये सब मरणधर्मा हैं।

सनातन वह है जो न जन्मा है, न मरेगा; न जिसे सोचा जा सकता है, न अनुभव की वस्तु बनाया जा सकता है। वह देखने-सुनने की चीज़ नहीं है। उसी को वेदांत [[सत्य]], [[ब्रह्म]], राम, कृष्ण, शिव जैसे नामों से पुकारता है—पर ध्यान रहे, ये नाम तभी अर्थपूर्ण हैं जब इनके साथ कोई कथा, रूप, इतिहास या कल्पना न जुड़ी हो।

सनातन = आत्मा।
धर्म = मन को आत्मा की ओर ले जाना।

इस परिभाषा को आत्मसात कर लेना ही प्रारंभिक स्पष्टता है।


प्रकृति और आत्मा का भेद

प्रकृति  |  आत्मा
----------------------
जन्म     |  अजात
परिवर्तन |  अचल
विचार    |  निर्विचार
आकार     |  निराकार
समय      |  अकाल
गुण      |  निर्गुण

प्रकृति में जो कुछ है, वह परिवर्तनशील है। मन भी प्रकृति का ही अंश है; इसलिए मन अस्थिर है, अशांत है। मन को शांति चाहिए—पर वह शांति भी यदि किसी सुख, परिस्थिति या उपलब्धि से जोड़ी गई, तो वह भी प्रकृति का ही खेल रह जाएगी।

यहाँ एक सूक्ष्म भेद समझना होगा:

धर्म का उद्देश्य धर्म का उद्देश्य नहीं
जन्मगत अस्तित्वगत दुःख से मुक्ति सुख की प्राप्ति
मन को आत्मा की ओर ले जाना मन को बेहतर परिस्थिति दिलाना
अहं का लय अहं का विस्तार

धर्म सुख का कार्यक्रम नहीं है। सुख भी प्रकृति का ही एक अनुभव है। धर्म का उद्देश्य है उस मूल बेचैनी का अंत, जो केवल मनुष्य होने के कारण है—जिसे हम [[अस्तित्वगत दुख]] कह सकते हैं।

मन अशांत पैदा होता है और अपनी अशांति को ही बढ़ाता रहता है। इसलिए धर्म है—मन को प्रकृति से उठाकर आत्मा की ओर ले जाना।


काल को खा जाना : मृत्यु का सही अर्थ

काल में जन्म
      ↓
काल से बंधन
      ↓
काल का अतिक्रमण
      ↓
“मुआ काल को खाये”

“एक अचंभा देखिया मुआ काल को खाये।”

यहाँ मरना शरीर की मृत्यु नहीं है। यह प्रकृति के प्रति मरना है। जो समय में बँधा था, वह समय के पार चला गया। यही जीवन का लक्ष्य है—काल में जन्म लेकर काल का अतिक्रमण कर जाना।

कबीर कहते हैं:

जिस मरने से जग डरे, मेरो मन आनंद।

यह मरना है—आशा का टूटना, अपेक्षा का अंत, **[[अहंकार अहं]]** का क्षय। जब कोई आशा टूटती है, हम कहते हैं—“सब खत्म हो गया।” यही छोटा-सा मरना है। और फिर हम नया लक्ष्य, नई पहचान पकड़ लेते हैं—इसे ही सूक्ष्म अर्थ में [[पुनर्जन्म]] कहा गया है।

जब तक आशा है, तब तक पुनर्जन्म है।
जब तक आकांक्षा है, तब तक मन जीव है।


प्राणी, अहं और वेदान्त की चोट

द्रष्टा  ↔  दृश्य
    (अलग मानना)
          ↓
         अहं
          ↓
      “मैं प्राणी हूँ”

वेदान्त का विशेषत्व यह है कि वह बाहर की वस्तुओं से अधिक पूछने वाले को देखता है। विज्ञान नौ चीज़ों को देखता है; वेदान्त दसवीं को—देखने वाले को।

जब आप पूछते हैं, “यह खंभा क्या है?”, उसमें छिपी मान्यता है—“मैं तो हूँ ही।” वेदान्त इसी “मैं” पर प्रश्न करता है।

प्रकृति में द्रष्टा और दृश्य साथ-साथ चलते हैं। जो दुनिया दिख रही है, वह देखने वाले की स्थिति से अलग नहीं है। नशीला पदार्थ लेने पर दुनिया बदल जाती है; बुद्ध से मिलने पर अंगुलिमाल की दुनिया बदल जाती है; कुत्ते की सुनने की क्षमता अलग है, तो उसकी दुनिया अलग है। दुनिया कोई एक वस्तुनिष्ठ स्थिर इकाई नहीं; वह देखने वाले पर निर्भर है।

तो प्रश्न उठता है—ये सारे प्राणी किसकी दृष्टि में हैं?
जब तक आप अपने को प्राणी मानते हैं, तब तक प्राणी दिखेंगे।
जैसे ही “मैं प्राणी हूँ” यह मान्यता टूटती है, विभेद मिटने लगता है।

न मे जीव इति ज्ञात्वा स जीवन्मुक्त उच्यते।

“मैं जीव नहीं हूँ”—यह जानना ही जीवनमुक्ति है।

प्राणी की परिभाषा ही है—अपने को पृथक मानना।
और पृथक मानना ही [[अहंकार]] है।

तात्विक दृष्टि से दीवार भी पंचभूत है और शरीर भी पंचभूत है। अंतर केवल इतना कि शरीर “मैं” कहता है। जब भीतर झाँकते हैं, तो पाते हैं कि यह “मैं” भी एक कल्पना है। तब भेद मिटने लगता है। इस भेद-मिटने का नाम है [[समता]] या [[समत्व]] ।

विषय  |  विषयी
   ↓ भेद मिटा ↓
      समत्व

चेतना, चुनाव और मुक्ति

चेतना
   ↓
चुनाव
   ↓
बंधन
   ↓
दुःख

चेतना के स्तर अलग-अलग हैं—यह कोई शाश्वत सत्य नहीं, बल्कि चुनाव है। लोग अलग-अलग इसलिए दिखते हैं क्योंकि सबने अपने-अपने बंधन चुने हैं। वेदान्त कहता है—तुम भटके हुए नहीं हो; तुम केवल नशे में हो। तुम्हें कुछ पाना नहीं है; जो पकड़ा है उसे छोड़ना है।

सत्य पहले से है।
तुम सत्य हो, पर व्यर्थ आवरणों में लिपटे हो।

यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद है:

पाने का मार्ग समझने का मार्ग
कुछ जोड़ना भ्रम हटाना
समय लेता है क्षण में स्पष्ट हो सकता है
बाहरी यात्रा आंतरिक बोध

समझने में समय नहीं लगता; पर उस बिंदु तक पहुँचने के लिए जहाँ समझ घटित हो सके—श्रम करना पड़ता है। यही ब्राह्मण और श्रमण धाराओं का समन्वय है।


साक्षीभाव का वास्तविक अर्थ

देखना
   ↓
खुद को पीछे छोड़ना
   ↓
साक्षीभाव

साक्षीभाव कोई भावुकता नहीं है। [[साक्षीत्व]] एक कठोर ईमानदारी है—सच के प्रति प्रेम। साक्षीत्व का अर्थ है—अप्रतिभागी होना।

देखना है, पर कुछ बनकर नहीं।
सुनना है, पर मनचाहा सुनने की नियत से नहीं।
अवलोकन को होने देना—यह है [[साक्षीत्व]]

यहाँ सावधानी आवश्यक है: “मैं साक्षी हूँ”—यह कहना ही साक्षीभाव को नष्ट कर देता है। जहाँ “मैं” बोलता है, वहाँ सहभागिता है। साक्षीभाव में “मैं” पीछे हट जाता है।

गीता कहती है:

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।

न फल में आसक्ति, न अकर्म में।
सिर्फ एक त्याग वास्तविक है—अहंकार का त्याग। बाकी सारे त्याग नकली हो सकते हैं।


भीतर का अस्पर्शित बिंदु

दुनिया की चीज़ें
      ↓
देह, नाम, संबंध
      ↓
छूटने योग्य

भीतर का बिंदु
      ↓
अस्पर्शित
      ↓
आत्मा

दुनिया की चीज़ें—देह, नाम, शौहरत, संबंध—दुनिया की हैं; वे जाएँगी। गलती तब होती है जब उन्हें “अपना” मान लेते हैं। दूसरी गलती तब होती है जब जो सचमुच अपना है—उसे दुनिया को सौंप देते हैं।

भीतर एक बिंदु होना चाहिए जो बिकाऊ न हो, जिस पर कोई शर्त न लगे— मृत्यु भी नहीं। वही जीवितता है।


दुख के नाम बदलने से दुख नहीं बदलता

बेचैनी
   ↓
नाम बदल दिया
   ↓
कर्तव्य / महत्वाकांक्षा / मोह
   ↓
पर दुख वही

कोई कहता है—“मैं महत्वाकांक्षी हूँ।” पर भीतर भय है—असफल न हो जाऊँ। दुख को हमने अनेक नाम दे दिए हैं—[[कर्तव्य]], [[महत्वाकांक्षा]], [[मोह]]—पर नाम बदलने से बीमारी नहीं जाती।

वेदान्त ईमानदार लोगों के लिए है। पहले मानना पड़ेगा कि बेचैनी है।


आत्मा को अवधारणा न बनाना

आत्मा
  ×
कल्पना
  ×
भावनात्मक रस

कुत्ता हड्डी चबाकर अपने ही खून का रस लेता है। इसी तरह आत्मा को अवधारणा बनाकर उससे भावनात्मक आनंद लेना—यह भी एक सूक्ष्म धोखा है। इसलिए ऋषियों ने आत्मा पर पहरे लगाए—“नेति नेति।”

आत्मा का स्मरण कम, अपने बंधनों का निरीक्षण अधिक।
बंधन पहचानो—उसी में मुक्ति का द्वार है।


प्रेम, भक्ति और ज्ञान

ज्ञान बिना भक्ति → अंधविश्वास
भक्ति बिना ज्ञान → अहंकारी ज्ञान
ज्ञान + प्रेम → प्रामाणिक साधना

भक्ति का अर्थ है—उच्चतम के प्रति विभाजन का बोध और उसके प्रति [[प्रेम]]। पर यदि आत्मज्ञान नहीं है, तो भक्ति केवल भावुकता है। और यदि प्रेम नहीं है, तो ज्ञान केवल अहंकार है।

[[भक्ति]] और [[ज्ञान]] अंततः एक ही हैं।


काल भवन और आसमान

काल भवन (99 मंज़िल)
      ↑
चेतना की प्रगति
      ↑
पर अब भी काल में

भवन से बाहर
      ↓
आसमान
      ↓
मुक्ति

The 99 floors of consciousness.
चेतना काल भवन की मंज़िलों पर चढ़ सकती है—पर वह अब भी काल में है। मुक्ति भवन से बाहर उड़ जाना है। यह पूर्णता कमाने से नहीं मिलती; यह अनुग्रह है। पर अनुग्रह उसी को मिलता है जिसने अपनी ओर से सब कुछ दे दिया हो।

जैसे बच्चा 15 रुपये लेकर 250 की चॉकलेट खरीदने चला जाए—उसके पास पूर्ण मूल्य नहीं, पर पूर्ण समर्पण है। मुक्ति कीमत से नहीं, समर्पण से मिलती है।


सनातन धर्म की अंतिम परिभाषा

प्रकृति = परिवर्तनशील  
मन = परिवर्तन से तादात्म्य  
तादात्म्य = अस्थिरता = दुःख  

आत्मा = जो परिवर्तन से अछूता है = सनातन  

धर्म = मन की पहचान को परिवर्तन से हटाकर  
        सनातन में स्थापित करना

सनातन धर्म कोई परंपरा, मत, कथा या पहचान नहीं है।
सनातन धर्म है—मन को प्रकृति के पार ले जाना।

प्रकृति सनातन नहीं।
सनातन है वह जो कल्पना के पार है, नाम के पार है, समय के पार है। नाम देना भी एक व्यावहारिक मजबूरी है; संभव हो तो मौन ही रहे।

मन को प्रकृति से हटाकर आत्मा की ओर ले जाना—यही सनातन धर्म है।
इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह समय का खेल है।

और अंत में, यही समग्र सूत्र रह जाता है:

समझने में ही मुक्ति है।
पाने से नहीं, देखने से स्वतंत्रता है।
अहं का लय ही अमरता है।