समत्व ही शिवत्व है
मुख्य विचार:
[[समता]] — विषय और विषयी का भेद मिट जाना।
जब भीतर और बाहर, आत्म और अनात्म, विषय और विषयी का भेद समाप्त हो जाता है, तब अहंकार मिटता है । अहंकार के मिटने को ही शिवत्व कहते है।
व्याख्या:
- समत्व = सभी भेदों का अंत।
- विषय और विषयी में भेद मिट जाना = अहंकार का नाश।
- यह केवल अनुभव से समझ में आता है, सिद्धांत या पूजा से नहीं।
- समत्व में रहने वाला व्यक्ति निष्कर्म, शांत और मुक्त होता है।
आध्यात्मिक सार:
- समत्व = चेतना की परम अवस्था।
- समत्व के अनुभव से ही अहंकार समाप्त होता है और शिवत्व प्रकट होता है।
- “समत्व ही शिवत्व है” – यही गूढ़ सार है।
संबंधित अवधारणाएँ
[[समता]]
[[अवधूत गीता — जहाँ मैं नहीं, वहीं शिव]]
[[अहंकार|अहम्]]
[[साक्षीभाव]]