समय
काल‑काल सब कोई कहे, काल न चीन्है कोय।
जेती मन की कल्पना, काल कहवै सोय॥
मूल विचार
[[अहंकार|अहं]] = समय का केंद्र
समय = मनोवैज्ञानिक दूरी
समय कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है — द्वैत में बने संबंध और उनसे उत्पन्न परिवर्तन का अनुभव ही समय है।
व्याख्या
जब “मैं” और “जगत” अलग प्रतीत होते हैं, तब उनके बीच संबंध बनते हैं।
हर संबंध परिवर्तन लाता है — उसी परिवर्तन की अनुभूति को हम समय कहते हैं।
मुख्य बिंदु
- [[द्वैत]] → संबंध → परिवर्तन → समय
- अपूर्णता समय को चलाती है
- असंतोष समय की मनोवैज्ञानिक जड़ है
- संतोष होता तो समय का अनुभव नहीं होता
एक पंक्ति सार
समय वस्तु नहीं — द्वैत में परिवर्तन का अनुभव है।
संबंधित अवधारणाएँ
[[मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमे हैं]]