साक्षीत्व

विचार:
चयनरहित जागरूकता, जहाँ विचार और भावना केवल देखे जाते हैं।

व्याख्या:
अहं ढीला पड़ता है, प्रतिक्रिया नहीं आती, केवल जागरूकता रहती है।

वो कोई भाव नहीं होता, भाव बगेरा में मत पड़ना ।
वो एक जिद होती है , एक संकर्ल्प, एक इरादा होता है ।

देखना तो है लेकिन कुछ बनकर नहीं देखना, देखना तो है लेकिन कुछ खोजते गुए नहीं देखना, देखना तो है लेकिन कुछ चाहते हुए नहीं देखना, सुनना तो है लेकिन इस नियत से नहीं देखना की जो सुनना है वही सुनाई दे ।

स्वयं से निरपेक्ष होकर प्रकर्ति के अवलोकन को होने देने को [[साक्षीत्व]] कहते है ।

आध्यात्मिक सार:
अद्वैत अनुभूति; मनोवैज्ञानिक दूरी का अंत।

संबंधित अवधारणाएँ
[[समता]]
[[मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमे हैं]]
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[[सनातन धर्म क्या है — मन को प्रकृति के पार ले जाना]]