होश माने क्या
होश माने क्या?
“होश वह जीवित जागरूकता है जिसमें मन चल रहा होता है,
पर तुम मन नहीं होते।”
व्याख्या:
होश का अर्थ केवल जागना (awake) नहीं है।
होश का अर्थ है — जागते हुए जानना।
- चल रहे हो — और जानते हो कि चल रहे हो।
- बोल रहे हो — और जानते हो कि बोल रहे हो।
- क्रोध उठ रहा है — और जानते हो कि क्रोध उठ रहा है।
यह “जानना” ही होश है।
होश में क्रिया रुकती नहीं,
पर पहचान बदल जाती है।
होश की प्रकृति
“होश = वर्तमान में उपस्थित चेतना”
व्याख्या:
होश अतीत की कहानी में नहीं रहता।
होश भविष्य की कल्पना में नहीं खोता।
होश अभी में स्थिर होता है।
जब मन अनदेखा चलता है —
वह आदत है।
जब मन देखा जाता है —
वह होश है।
होश का अर्थ विचार रोकना नहीं,
विचार को होते हुए देखना है।
आध्यात्मिक अर्थ
होश = साक्षीभाव की जीवित अवस्था
जब [[चेतना]] स्वयं को भूल जाती है,
तो [[अहंकार]] बन जाता है।
जब चेतना स्वयं को याद रखती है,
तो वही होश है।
होश में व्यक्ति प्रतिक्रिया नहीं करता —
वह उत्तर देता है।
होश में द्वंद्व कम हो जाता है,
क्योंकि देखने वाला अलग खड़ा है।
होश अभ्यास से गहराता है,
पर उसकी जड़ हमेशा वर्तमान में ही है।
सार
होश कोई विशेष अवस्था नहीं,
बल्कि सामान्य जीवन की असाधारण स्पष्टता है।
जहाँ अनजाना जीवन चल रहा है — वहाँ नींद है।
जहाँ जीवन देखा जा रहा है — वहीं होश है।
होश का अर्थ है —
जीवन को स्वचालित नहीं,
सचेत होकर जीना।