अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर की सैर
प्रेम के शहर में गुम हो जाओ और आत्मा को जानो ।
अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर की सैर
अपने आप नूं खोज रहा हूं ना सिर हाथ ना पैर
किथै पकड़ लै चलै घरां थीं कौन करै निरवैर
प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम ने चिन्हे कोय।
जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।।खुदी खोई अपना आप चीना तब होई कुल खैर
बुल्ला साईं दोई जहानी कोई न दिखता गैर
प्रेम प्याला जो पिए, सीस दक्षिणा देय।
लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय।।~ बाबा बुल्लेशाह, कबीर साहब
“अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर की सैर” अब हम खो गए हैं, खो गए हैं, प्रेम नगर की यात्रा में
सांसारिक व्यक्ति जीवन में खोने से बहोत डरता है । उसे संतुसती तभी रहती है तब तक उसके अनुसार सब नित्या हो और अनित्य होने से बो बचके चलता है ।
लेकिन संत जीवन के रास्ते में गुम हो जाने पर उत्साह मना रहे है । जीवन ही प्रेम है और जीवन में गुम होना मलतब प्रेम के शहर में गुम हो गए है । और प्रेम के शहर में गुम होने का मतलब है की सत्य के निकट पहुचना ।
“अपने आप नूं खोज रहा हूं ना सिर हाथ ना पैर” मैं खुद को खोज रहा हूँ, न सिर है, न हाथ, न पैर।
मैं अपने ही आप को खोज रहा हूँ, मुझे अपने सिर, हाथ, पैर दिखाई भी नहीं देते ।
“किथै पकड़ लै चलै घरां थीं कौन करै निरवैर” कहाँ पकड़ूँ और कहां जाऊं, घर (सत्या / आत्मा) की ओर, कौन है जो बिना द्वेष के साथ चल सके?
यह पुकार है — सच्चा गुरु चाहिए जो निरवैर हो, जो स्वयं पार हों, वही पार करा सकते हैं। संसार में हर कोई अपने स्वार्थ के घेरे में फँसा है; प्रेम में कोई बैर नहीं होता।
“प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम ने चिन्हे कोय।
जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय॥” सब लोग प्रेम का नाम लेते हैं, लेकिन प्रेम को समझता कौन है?
वह मार्ग जहाँ साहब (परम सत्य) मिले, वही प्रेम कहलाता है।
प्रेम कोई भावना नहीं, साधना है। जो मार्ग ईश्वर तक ले जाए, वही प्रेम है। बाकी जो केवल ‘मैं’ को सहलाए, वह आसक्ति है, प्रेम नहीं।
“खुदी खोई अपना आप चीना तब होई कुल खैर” जब अपने अहंकार को खो दिया और आत्मा को पहचाना, तभी सब कुछ अच्छा हुआ
- खुदी खोई → जब अहंकार मिटा।
- अपना आप चीना → तब सच्चा स्व पहचाना।
- तब होई कुल खैर → तब उसे हर ओर से शांति और कल्याण मिलता है
अहंकार खत्म होते ही मूल स्व का दर्शन होता है। जब ‘मैं’ मिटता है, तब ही सच्ची भलाई (कुल खैर) होती है। जब तक खुदी है, प्रेम नहीं जन्मता।
“बुल्ला साईं दोई जहानी कोई न दिखता गैर” बुल्ला (बाबा बुल्लेशाह) कहते हैं, साईं (ईश्वर) दो दुनियाओं में हैं, और कोई अलग नहीं दिखता।
प्रेम का अर्थ है, सारा भेद मिट गया। अब ‘मैं’ और ‘तुम’ बाकी नहीं रहे। जो भी दिखता है, वही एक है — वही ब्रह्म, वही साहब। प्रेम दृष्टि को एकरस कर देता है।
“प्रेम प्याला जो पिए, सीस दक्षिणा देय।
लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय॥” जो प्रेम का प्याला पीते हैं, वे अपने सिर का दान करते हैं,
लोभी सिर नहीं दे सकते, लेकिन वे ‘प्रेम’ शब्द का दिखावा करते है।
- प्रेम प्याला जो पिए → जो प्रेम का अमृत पिए।
- सीस दक्षिणा देय → उसे अपने सिर (अहंकार, पहचान) की बलि देनी पड़ती है।
- लोभी सीस न दे सके → जो स्वार्थी है, वह समर्पण नहीं कर पाता।
- नाम प्रेम का लेय → वह केवल ‘प्रेम’ शब्द का दिखावा करता है।
सच्चा प्रेम बलिदान मांगता है। जब तक जीवन, अहंकार और चयन अपने हैं, तब तक प्रेम दूर है। प्रेम में सब कुछ अर्पित हो जाता है — बस शेष रह जाता है वह ।