अमरपुर ले चलो सजना

हे आत्माकेंद्र मुझे आत्मा के ओर ले चलो ।

अमरपुर ले चलो सजना

अमरपुर ले चलो सजना,
अमरपुर ले चलो सजना ।

अमरपुर की साँकर गलियाँ,
अड़बड़ है चलना ।

गुरु ज्ञान शब्द की ठोकर,
उघर गये झपना ।

वहीं अमरपुर लागि बज़रिया,
सौदा है करना ।

अमरपुर संत बसत है वहीं,
दर्शन है लहना ।

संत समाज जहाँ बैठी,
वहीं पुरुष अपना ।

कहत कबीर सुनो भाई साधो,
भवसागर तरना ।

~ कबीर साहब


“अमरपुर” कोई भौगोलिक जगह नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति की अवस्था है — वह ठिकाना जहाँ मन अमर हो जाता है, जहाँ मृत्यु और भय का कोई असर नहीं रहता।


“अमरपुर ले चलो सजना,
अमरपुर ले चलो सजना॥”
मुझे अमरपुर (अमरावती, जो निरंतर और शाश्वत स्थान है) ले चलो, मेरे सजना (प्रिय)।

  • अमरपुर ले चलो सजना → हे प्रिय (गुरु / सत्य), मुझे उस अमर लोक में पहुँचा दो — जहाँ अस्थायी नहीं, शाश्वत सत्य का अनुभव हो।

कबीर ‘अमरपुर’ को आत्मा की स्थिति कहते हैं जहाँ न जन्म है, न मृत्यु। साधक की प्रार्थना है — “मुझे वहाँ ले चलो जहाँ मन टिक जाए, जहाँ अंत न हो।”


“अमरपुर की साँकर गलियाँ,
अड़बड़ है चलना॥”
अमरपुर की संकरी गलियाँ हैं, जिनमें चलने के लिए हमें सावधानी से कदम बढ़ाने होते हैं।

  • साँकर गलियाँ → बहुत सँकरी, कठिन राह।
  • अड़बड़ है चलना → चलना कठिन है।

मुक्ति की राह अत्यंत सुक्ष्म और कठिन है। वहाँ अहंकार, लोभ, वासना के लिए जगह नहीं। यह मार्ग तर्क या दिखावे से नहीं, विनम्रता और जागरूकता से पार होता है।


“गुरु ज्ञान शब्द की ठोकर,
उघर गये झपना॥”
गुरु का ज्ञान और शब्द की ठोकर से हम अपने भ्रम और निद्रा (झपना) से बाहर निकल जाते हैं।

  • गुरु ज्ञान शब्द की ठोकर → जब गुरु के वचन का आघात होता है, वह झकझोर देता है।
  • उघर गये झपना → भीतर के ढके हुए अंधकार, भ्रम और आलस्य उजागर हो जाते हैं।

गुरु का वचन दवा नहीं, प्रहार है। जो सुनने को तैयार हो, उसकी नींद टूट जाती है। कबीर कह रहे हैं — “गुरु के शब्द की ठोकर से भीतर का झूठ फूट जाता है।” यही जागरण की शुरुआत है।


“वहीं अमरपुर लागि बज़रिया,
सौदा है करना॥”
वहीं अमरपुर में एक बाजार है, जहाँ हमें सही सौदा करना है (अर्थात् आत्मज्ञान और भक्ति का व्यापार करना है)।

आत्मज्ञान का सौदा वहीं होता है — जहाँ मन अपनी झूठी पहचान बेच दे और बदले में सत्य ले ले। यह व्यापार संसार का नहीं, अस्तित्व का है: “अहंकार दे दो, परमात्मा लो।”


“अमरपुर संत बसत है वहीं,
दर्शन है लहना॥”
अमरपुर में संत निवास करते हैं, जहाँ उनके दर्शन से आत्मा को शांति मिलती है।

  • संत बसत है वहीं → उस अमरपुर में संत उपस्थित हैं।
  • दर्शन है लहना → वहाँ पहुँचकर ही उनका साक्षात्कार संभव है।

संत बाहरी व्यक्ति नहीं, भीतर की जागरूकता का रूप हैं। जब मन शुद्ध और स्थिर हो जाता है, वही संत स्वरूप प्रकट होता है।


“संत समाज जहाँ बैठी,
वहीं पुरुष अपना॥”
जहाँ संत समाज बैठते हैं, वहीं सच्चा पुरुष (आत्मज्ञानी) अपने वास्तविक रूप में होता है।

  • संत समाज जहाँ बैठी → जहाँ संतों का संघ है, अर्थात जहाँ चेतना निर्मल है।
  • वहीं पुरुष अपना → वही सत्य पुरुष (परमात्मा) वहाँ विद्यमान है।

परमात्मा वहीं है जहाँ शुद्ध चेतना, ज्ञान और करुणा है। जो कंपनी मनुष्यों में नहीं, बल्कि सत्य में साधता है — वही अमरपुर का वासी होता है।


“कहत कबीर सुनो भाई साधो,
भवसागर तरना॥”
कबीर कहते हैं, सुनो साधो, यही तरीका है भवसागर (जन्म-मृत्यु के चक्र) से पार होने का।

कबीर का अंतिम सार है — यह संसार एक सागर है, और पार वही जा सकता है जो ‘अमरपुर’ की दिशा में चलता है।
गुरु की ठोकर, आत्मा की शुद्धि, और अहंकार के विसर्जन से ही यह यात्रा पूरी होती है।

updated_at 21-12-2025