घूँघट के पट खोल रे

घूँघट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे।

घट घट में तेरे साईं बसत है, कटु वचन मत बोल रे।

धन जोबन का गर्व न कीजै, झूठा पंच रंग चोल रे।

शून्य महल में दिया जलत है, आशा से मत डोल रे।

जोग जुगत से रंग महल में, पिया पाये अनमोल रे।

कहैं कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढोल रे।

~ कबीर साहब


“घूँघट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे।
घूँघट (चेहरे का पर्दा) हटा, क्योंकि तुझे अपने सच्चे गुरु या भगवान से मिलना है।

“घट घट में तेरे साईं बसत है, कटु वचन मत बोल रे।
तेरे भीतर हर जगह तेरा साईं (ईश्वर) है, इसलिए कड़वे शब्द न बोल।

“धन जोबन का गर्व न कीजै, झूठा पंच रंग चोल रे।
धन और युवावस्था पर घमंड मत कर, क्योंकि ये सब झूठे दिखावे की तरह हैं।

“शून्य महल में दिया जलत है, आशा से मत डोल रे।
खाली महल में दीया जल रहा है, आशा और इच्छाओं के पीछे मत भाग, शांति से रह।

“जोग जुगत से रंग महल में, पिया पाये अनमोल रे।
सच्चे साधना और प्रयास से भगवान के रंग महल में, सच्चा प्रेम पाया जाता है।

“कहैं कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढोल रे।
कबीर कहते हैं, सच्चे आनंद का अनुभव हो रहा है, जैसे अनहद (निरंतर) डमरू की ध्वनि बज रही हो।


यह कविता कबीर साहब की उस गहरी शिक्षाओं का हिस्सा है, जो हमें दुनियावी चीजों से दूर रहकर सच्चे आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करती है। वे बताते हैं कि आंतरिक शांति और सच्चा प्रेम बाहरी भौतिकताओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

updated_at 21-12-2025