मैनूं कौन पछाणे
मैनूं कौन पछाणे
मैनूं कौन पछाणे,
मैं कुझ हो गई होर नी ।।
हादी मैनूं सबक़ पढ़ाया,
ओत्थे होर न आया-जाया,
मुतलिक जात जमाल विखाया,
वहदत पाया ज़ोर नी ।।
अव्वल होके लामकानी,
ज़ाहर बातन दिसदा जानी,
रही न मेरी नाम निशानी,
मिट गया झगड़ा-शोर नी ।।
प्यारे आप जमाल विखाली,
होइ कलन्दर मस्त मवाली,
हंसा दी हुण वेख के चाली,
भुल गई कागां टोर नी ।।
~ बाबा बुल्लेशाह जी